राजस्थान हाईकोर्ट का संवेदनशील फैसला, 16 साल की रेप पीड़िता को 7 महीने की प्रेग्नेंसी में दी एबॉर्शन की अनुमति

Rajasthan High Court Minor Abortion Permission: राजस्थान हाईकोर्ट ने POCSO एक्ट के एक गंभीर मामले में 16 साल की नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को 7 महीने की प्रेगनेंसी में एबॉर्शन करने की परमिशन दे दी है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए गर्भ गिराने के लिए तुरंत आवश्यक कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद ही जोधपुर कलेक्टर आलोक रंजन ने CMHO को नोडल अधिकारी नियुक्त करते हुए पीड़िता को सिरोही से जोधपुर शिफ्ट करने के लिए एम्बुलेंस सिरोही भेजी।
जानकारी के अनुसार, नाबालिग के साथ बलात्कार की खबर तब बाहर आई, जब उसकी प्रेगनेंसी को 27 हफ्ते पूरे हो चुके थे। पीडिता के दादा ने पोक्सो एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई और हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
पहली सुनवाई में ही कोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड का गठन करवाकर रिपोर्ट पेश करने को कहा। बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पीडिता का भ्रूण 24 हफ़्तों से ऊपर निकल चुका है, जिसके चलते एबॉर्शन में खतरा हो सकता है। साथ ही, पीडिता को एनीमिया भी है। थोड़ी गंभीरता हो सकती है, लेकिन विशेषज्ञों की देखरेख में गर्भपात संभव है।
पीडिता से उसकी इच्छा पूछने पर वह भी एबॉर्शन के लिए राज़ी थी। इसलिए रिपोर्ट पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी।
कोर्ट ने आदेश में कहा कि पीड़िता की मानसिक और शारीरिक स्थिति के साथ-साथ उसे संवैधानिक अधिकारों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। कोर्ट के आदेश पर जिला कलेक्टर ने CMHO को नोडल अधिकारी नियुक्त किया। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि गर्भपात प्रक्रिया के दौरान इलाज और दवाओं के साथ पीडिता और परिवार के आने-जाने, रहने और भोजन की जिम्मेदारी और खर्चा राज्य सरकार उठाएगा।
हाईकोर्ट ने मेडिकल अधिकारी और जांच अधिकारी को भ्रूण के डीएनए और अन्य चिकित्सकीय व फॉरेंसिक सबूतों को सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए, ताकि मामले में दुष्कर्म की अग्रिम जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।
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