भगवान होने के सबूत मांगने वालों..देख लो दुनिया के बड़े-बड़े साइंटिस्ट क्या कहते हैं, न्यूटन से लेकर ओपेनहाइमर तक ने माना सुप्रीम पॉवर का अस्तित्व

आज के इस दौर में हमें अपने आस-पास ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो भगवान के अस्तित्व पर ही सवाल उठाते हैं। वो किसी सुप्रीम पॉवर को नहीं मानते। वो सिर्फ तर्क और सबूत में विश्वास करते हैं। उनके तर्कों में ये भी होता है कि अभी तक किसी भी वैज्ञानिक ने भगवान को नहीं माना है या उनके अस्तित्व को नहीं माना है। तो यहां हम आपको ईश्वरीय शक्ति पर विज्ञान के इसी दृष्टिकोण के बारे में बता रहे हैं साथ ही उन वैज्ञानिकों के ईश्वर को लेकर विचार भी बता रहे हैं जिन्हें दुनिया सबसे महान साइंटिस्ट में गिनती है।
सर आइजैक न्यूटन
दुनिया के जिन महान वैज्ञानिकों ने ईश्वरीय शक्ति को स्वीकार किया है उनमें सबसे पहला नाम आता है गुरुत्वाकर्षण की खोज करने वाले सर आइजैक न्यूटन का। वे मानते थे कि ब्रह्मांड का ये शानदार सिस्टम कोई सामान्य संयोग नहीं है और ना ही इससे चल सकता है। इसके पीछे एक सर्वशक्तिमान है। वो बुद्धिमान रचयिता ही इस ब्रह्मांड का संचालक है। न्यूटन एकेश्वरवादी ईश्वर के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उन्होंने इसे सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता के रूप में देखा, जिसके अस्तित्व को समस्त इस ब्रह्मांड की भव्यता के सामने नकारा ही नहीं जा सकता था।
अलबर्ट आइंसटाइन
सापेक्षता के सिद्धांत से विज्ञान में क्रांति लाने वाले महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंसटाइन खुद को नास्तिक नहीं मानते थे। हालांकि वे पारंपरिक धर्मों वाले भगवान को नहीं मानते थे, लेकिन वे ब्रह्मांड के नियमों और उसकी खूबसूरती को सर्वोच्च शक्ति मानते थे। इसके संचालन में एक वे एक 'अज्ञात उच्च बुद्धि' वाली शक्ति में विश्वास रखते थे। वे मानते थे कि ब्रह्मांड और इससे बाहर जो कुछ भी हो रहा है वो इतना सटीक है, इतना निश्चित है, कि उसका कोई तोड़ नहीं है, जिस शक्ति से ये सब कुछ चल रहा है उनके लिए ही वो सर्वशक्ति थी।
मैक्स प्लांक
क्वांटम फिजिक्स के जनक वैज्ञानिक मैक्स प्लांक का कहना था कि विज्ञान और धर्म दोनों को ही ईश्वर की जरूरत है। दोनों ही भगवान के बिना अधूरे हैं। एक आस्तिक के लिए भगवान शुरुआत में हैं, तो एक भौतिकविद् के लिए वे हर विचार के आखिर में हैं। विज्ञान के यात्रा के अंत में उन्हें भगवान या एक सुप्रीम पॉवर का अहसास होता है। उनका कहना था कि भगवान ब्रह्मांड के नियमों और हर पदार्थ के पीछे मौजूद एक सचेत, बुद्धिमान शक्ति का स्रोत हैं।
जोहान्स केप्लर
जर्मन खगोलशास्त्री जोहान्स केप्लर, जिन्होंने ग्रहों की गति के तीन नियमों की खोज की थी, वे भगवान को ब्रह्मांड का महान रचयिता और योजनाकार मानते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि विज्ञान और खगोल विज्ञान के जरिए ब्रह्मांड के नियमों को समझना ही भगवान के विचारों को उनके बाद दोहराना है। उनका मानना था कि भगवान ने इस ब्रह्मांड को एक गणितीय रूप से बेहद सुव्यवस्थित तरीके से बनाया है कि इसमें त्रुटि ही नहीं है। जबकि दुनिया में ऐसा कोई पदार्थ, नियम ऐसा नहीं है जो आदर्श हो, यानी उसमें लेशमात्र की त्रुटि भी ना हो।
स्पेस एजेंसियों तक ने मानी भगवान की शक्ति
दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक संगठन CERN, जहां गॉड पार्टिकल की खोज हुई थी, उनके जेनेवा स्थित मुख्यालय में भगवान शिव के नटराज स्वरूप की कांस्य की प्रतिमा स्थापित है। जो कि 2 मीटर ऊंची है। इसके पीछे भौतिकविदों का मानना है कि परमाणु के भीतर के कण की गति, रचना और विनाश का जो चक्र है, वो भगवान शिव के 'कॉस्मिक डांस' यानी तांडव जैसा ही है। इसका प्रमाण भी यही पर दिखाया गया है। यहां नटराज की मूर्ति के पास लगे बोर्ड पर महान भौतिकविद् फ्रीटजॉफ काप्रा का कथन लिखा है। इसमें उन्होंने आधुनिक भौतिकी यानी Modern Physics को नटराज के नृत्य का ही एक रूप बताया है।
ऱॉकेट लॉंचिंग से पहले भगवान के चरणों में उसे अर्पित करता है ISRO
भारत की स्पेस एजेंसी यानी इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन विज्ञान और सनातनी परपंरा का दुनिया में बेजोड़ उदाहरण है। इसरो के वर्तमान और पूर्व अध्यक्षों सहित वहां काम करने वाले सैकड़ों वैज्ञानिक किसी भी बड़े स्पेस मिशन से पहले तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर जो भगवान विष्णु का मंदिर है या चेंगलंम्मा परमेश्वरी मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। यहां पर ये वैज्ञानिक उनके चरणों में रॉकेट का छोटा मॉडल अर्पित करते हैं। इसरो के पूर्व प्रमुख एस. सोमनाथ ने आधिकारिक बयानों में कहा है कि विज्ञान, चिकित्सा और खगोल विज्ञान के कई सिद्धांत वेदों और संस्कृत ग्रंथों में पहले से ही मौजूद थे। इन्हें तो बाद में पश्चिमी वैज्ञानिकों ने नई खोजों के तौर पेश किया है।
ओपेनहाइमर का भगवत गीता दर्शन
परमाणु बम के जनक रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने दिया था भगवत गीता का संदर्भ परमाणु बम की खोज करने वाले ओपेनहाइमर ने अपने आधिकारिक बयान में कहा था कि जब उन्होंने पहला परमाणु परीक्षण देखा, तो उन्हें भगवान विष्णु के विराट रूप की याद आई। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था अगर आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदय हों, तो वह नजारा उस महाशक्तिशाली के तेज जैसा होगा, अब मैं काल यानी मृत्यु बन गया हूँ, जो लोकों का नाश करने वाला है। वे भगवत गीता को ब्रह्मांडीय व्यवस्था और मानवीय कर्तव्य का प्रतीक मानते थे। हालांकि वे व्यक्तिगत ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे, बल्कि खुद को एक अज्ञेयवादी मानते थे।
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