बस हादसों पर सवाल: आखिर कब थमेगा मौत का यह सफर?
भारत के अलग-अलग हिस्सों से लगातार बस हादसों की खबरें आ रही हैं। हर हादसे के बाद अख़बारों की सुर्खियाँ बदल जाती हैं, लेकिन उन परिवारों की ज़िंदगी कभी पहले जैसी नहीं हो पाती, जिन्होंने अपने अपनों को इन सड़कों पर खो दिया। सरकारी आंकड़े हर बार राहत देने की कोशिश करते हैं, पर हकीकत यह है कि जमीनी हालात कहीं अधिक भयावह हैं।
हर बार की तरह सरकारें जांच के आदेश देती हैं, मुआवज़े का ऐलान करती हैं, और कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य होने लगता है। लेकिन जिन परिवारों का चिराग बुझ जाता है, उनके लिए ज़िंदगी कभी सामान्य नहीं होती। कुछ हजार या लाख रुपये का मुआवज़ा शायद सरकारी कर्तव्य निभा दे, लेकिन क्या वह किसी माँ की आंखों के आँसू पोंछ सकता है? क्या वह किसी बच्चे के सिर से उठे पिता के साये को वापस ला सकता है?
संवेदनाएँ या दिखावा?
हादसे के बाद नेताओं और समाजसेवियों की संवेदनाओं की होड़ शुरू हो जाती है। सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने की जल्दी होती है, और अस्पताल जाकर घायलो से मिलने के नाम पर कैमरों की भीड़ जुटा दी जाती है। तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं, वीडियो बनाए जाते हैं — ताकि दुनिया देखे कि वे "जनता के साथ" हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि जब हादसे होते हैं, तब ये सब कहाँ होते हैं?
क्यों होते हैं इतने हादसे?
इन हादसों के पीछे कारण भी किसी से छिपे नहीं हैं
ओवरलोड बसें,
थके हुए ड्राइवर,
सड़क सुरक्षा के नियमों की अनदेखी,
और लापरवाह परिवहन व्यवस्था।
कभी सड़कें जिम्मेदार होती हैं, कभी गाड़ियाँ, और कभी वो सिस्टम जो हादसे के बाद ही जागता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हर बार कुछ जिंदगियाँ कुर्बान होने के बाद ही व्यवस्था "एक्शन में" आती है।
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