धर्मेंद्र थे एक बेहतर इंसान: कपिल शर्मा की मदद से लेकर बीकानेर के विकास के लिए बहाए आँसू तक

धर्मेंद्र सिर्फ एक बेहतर अभिनेता ही नहीं नहीं थे, बल्कि एक बेहतर इंसान भी थे। उस से जुड़े वैसे तो बहुत से वाक्य है जो धर्मेंद्र को एक बेहतर इंसान बनता है
कपिल शर्मा के शो पर पहुंचे धर्मेंद्र
ऐसा ही एक वाक्य है जब कपिल शर्मा ने अपना शो स्टार्ट किया था. शो का फॉर्मेट कुछ इस तरह का था की वह फिल्म के अभिनेता को शो पर बुला कर इंटरव्यू करते और मजाक करते थे। उस समय किसी को नहीं पता था की शो में क्या होने वाला है तो कपिल के शो में कोई भी सलेब्रिटी आने को तैयार नहीं था। ऐसे में उन को धर्मेंद्र पाजी का साथ मिला और वो भी 2 एपिसोड के लिए शो इतना हिट हुआ की कपिल शर्मा ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा उन दो शो आने के लिए पाजी ने कोई पैसा कपिल शर्मा से नहीं लिया
बीकानेर से बने थे सांसद
उन की इसी कड़ी में एक कहानी और भी है। यह घटना उस समय की है जब धर्मेंद्र बीकानेर से सांसद थे और राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा सरकार सत्ता में थी। धर्मेंद्र एक विशेष उद्देश्य से जयपुर पहुंचे थे—बीकानेर के विकास कार्यों को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए।
जयपुर में वे रेडकोर कार्यालय गए, जहां उनकी मुलाकात तत्कालीन मंत्रियों—राजेंद्र राठौड़, दिगंबर सिंह सहित कई वरिष्ठ नेताओं से हुई। बैठक का विषय था सांसद निधि और बीकानेर के विकास योजनाओं को मंजूरी दिलाना। धर्मेंद्र अपने क्षेत्र के लिए तैयार किए गए विकास मॉडल की फाइल लेकर पहुंचे थे, और उन्हें उम्मीद थी कि चुनाव से पहले जो आश्वासन मिला था, वह अब पूरा होगा।
भावुक हो गए धर्मेंद्र
राजेंद्र राठौड़ से विकास कार्य को लेकर बोले मैंने चुनाव लड़ने के लिए हां इसलिए की थी, क्योंकि आश्वासन दिया गया था कि बीकानेर के विकास के लिए मेरी सोच को सरकार पूरा करेगी। पर अब जब मैं जनता के सामने वापस जाता हूं तो क्या जवाब दूं? योजनाएं अटकी हुई हैं और जनता सवाल पूछती है।
मंत्रियों ने धर्मेंद्र को समझाया, भरोसा दिलाया, फिर भी यह साफ दिख रहा था कि धर्मजी की संवेदनशीलता और साफ दिल वाली राजनीति, सत्ता के उस कठोर ढांचे में फिट नहीं बैठती थी जहां अक्सर वादे करना आसान और निभाना मुश्किल होता है।
धर्मेंद्र की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वे जनता के दिल की बात सुनकर काम करना चाहते थे। उनके अंदर सच्चे जनसेवक का हृदय था—जो आज शायद राजनीति में कम ही दिखाई देता है। लेकिन राजनीति और सरकारों के तंत्र में ‘दिल’ की कोई जगह नहीं होती, यही दर्द उस दिन धर्मेंद्र की आंखों से बह निकला था।
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