Lalu Yadav's family: सत्ता, संघर्ष और बार-बार टूटने की दर्दनाक कहानी

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का परिवार हमेशा प्रभावी और शक्तिशाली रहा है लालू के परिवार की राजनीति की कहानी जितनी पुरानी है उतनी ही परिवार की टूटने के कहानी भी पुरानी है। लालू के बेटे तेजस्वी यादव को राजनीति और परिवार के टूटना दोनों ही विरासत में मिली है। हाल ही में रोहिणी आचार्य द्वारा परिवार और राजनीति से नाता तोड़ने ने वर्षों से पनप रही इन टूटन को फिर उजागर कर दिया।
लालू परिवार में पहली बड़ी दरार 1990 के दशक में पड़ी, जब राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं और उनके भाई साधु यादव और सुभाष यादव सत्ता में अत्यधिक प्रभावशाली हो गए। साधु यादव को लगा कि पार्टी में उन्हें सम्मान और हिस्सेदारी नहीं मिल रही। 2005 में सत्ता हाथ से निकलते ही वे खुलकर लालू परिवार के खिलाफ बोलने लगे। राबड़ी देवी ने उन्हें “परिवार विरोधी” तक कहा। दूसरी ओर, सुभाष यादव भी धीरे-धीरे परिवार से दूर होते गए और राजनीति से किनारा कर लिया।
इसके बाद 2018 में तेज प्रताप यादव और ऐश्वर्या राय की शादी टूटना लालू परिवार की अगली बड़ी सियासी दरार थी। समधी चंद्रिका राय पूरी तरह आरजेडी से अलग हो गए और एनडीए में शामिल होकर सीधा लालू परिवार के खिलाफ राजनीति करने लगे।
2025 में विवादों के बीच तेज प्रताप यादव को पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित करना परिवार की सबसे चौंकाने वाली घटनाओं में से एक रहा। तेज प्रताप ने खुद को “जयचंदों की साजिश” का शिकार बताया और बाद में अपनी नई पार्टी बना ली।
हाल ही में रोहिणी आचार्य ने परिवार से नाता तोड़ते हुए भावनात्मक पोस्ट लिखी, जिसमें उन्होंने आरोप लगाए कि उन्हें बदनाम किया गया और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनके बाद रागिनी, चंदा और राजलक्ष्मी भी पटना आवास छोड़कर दिल्ली चली गईं।
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