RTI एक्ट में बड़ा बदलाव: अब व्यक्तिगत और निजी जानकारी देने पर रोक, प्राइवेसी के नाम पर पारदर्शिता घटने की आशंका तेज़

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में दिनांक 14.11.2025 से एक नया संशोधित नियम लागू हो गया है, जो कहने के तो लिए व्यक्ति की प्राइवेसी को बचाए रखने के लिए लागू किया गया है, लेकिन इसी के साथ कई अनुभवी व्यक्तियों का मानना है कि इस बदलाव के बाद RTI एक्ट की शक्ति कम हो जाएगी और RTI सरकारी कार्यों में पारदर्शिता बनाये रखने का कुछ हिस्सा खो देगा।
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 की धारा 44(3) के तहत सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के सेक्शन 8(1)(J) में संशोधन किये गए हैं, जो किसी भी प्रकार की ‘व्यक्तिगत जानकारी’ को आम जन के साथ साझा करने से रोकती है। केवल एक शर्त पर इस प्रकार की निजी जानकारी देने की छूट दी गयी है, अगर वह जानकारी बहुत बड़े पैमाने पर सार्वजनिक हित से जुडी हुई हो। ये नया संशोधन तुरंत प्रभाव से लागू हो चुका है। सूचना का अधिकार में इस बदलाव के बाद निजी गोपनीयता (privacy) और पारदर्शिता के बीच के संतुलन को लेकर बहस उठ चली है।
क्या है DPDP (डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 और रूल्स, 2025)
DPDP अधिनियम किसी भी व्यक्ति के निजी डिजिटल डेटा की प्राइवेसी की रक्षा और नियंत्रित करता है। इस एक्ट का मकसद है- किसी भी व्यक्ति की प्राइवेसी की रक्षा करना और निजी डेटा के दुरुपयोग को रोकना। यह अधिनियम हर उस डेटा पर लागू होता है, जो किसी व्यक्ति के निजी जीवन से सम्बंधित है और भारत में किसी सेवा के तहत उपलब्ध कराया गया है।
RTI अधिनियम की पुरानी सीमाएं
अधिनियम की धारा 8(1)(j) के अनुसार, किसी भी सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, जन प्रतिनिधि- जैसे विधायक, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि व्यक्तियों की सामान्य रूप से व्यक्तिगत जानकारी, जैसे कर्मचारी के प्रदर्शन मूल्यांकन, संपत्ति का विवरण, शैक्षणिक विवरण, शिकायतें, आदि आमजन को प्रदान की जा सकती हैं। बशर्ते आवेदक को यह साबित करना होगा, कि जानकारी प्रकट करने में सार्वजनिक हित शामिल है जो व्यक्ति की निजता के अधिकार (privacy) से ज्यादा ज़रूरी है।
साथ ही, एक अपवाद के तहत ऐसी कोई भी जानकारी, जिसे देश की संसद या राज्य विधानसभा को देने से मना नहीं किया जा सकता, उसे आम नागरिक को देने से भी मना नहीं किया जा सकता है।
RTI अधिनियम में संशोधन पश्चात् नया नियम
इस संशोधन के अनुसार, यदि RTI आवेदन में ऐसी कोई जानकारी मांगी जा रही है, जो किसी व्यक्ति के निजी जीवन से सम्बंधित है, तो विभाग अब यह जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है। विभाग केवल वही सूचना उपलब्ध करा सकता है, जिसमें किसी व्यक्ति की निजता का हनन नहीं हो रहा हो। यदि किसी व्यक्ति की निजी जानकारी साझा की जा रही है, तो उस व्यक्ति द्वारा स्पष्ट और स्वतंत्र रूप से सहमति देना अनिवार्य है। या फिर किसी कानूनी बाध्यता के चलते दूसरे सरकारी विभाग सूचना प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन आम लोगों के लिए अब ये मुश्किल हो गया है।
इसे उदाहरण से समझते हैं। संशोधन के पहले, यदि आपको किसी सरकारी कर्मचारी पर भ्रष्टाचार का शक था, तो आप सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन कर सूचना प्राप्त कर सकते थे कि वो कर्मचारी कब-कौनसे विभाग में पदस्थापित था। किस अवधि तक उसने कार्य किया? उक्त अवधि में उसकी संपत्ति में कितनी वृद्धि हुई? उसकी शैक्षणिक योग्यता क्या है? किस नियमों के तहत उसे प्रशासन में पद दिया गया है? आदि।
इसी प्रकार आप अपने क्षेत्र के विधायक, मुख्यमंत्री या फिर प्रधानमंत्री से जुडी हुई जानकारी भी प्राप्त कर सकते थे। जैसे- उनकी सैलरी कितनी है? पद ग्रहण करने से पहले उनके नाम कितनी संपत्ति थी? वर्त्तमान में कितनी संपत्ति है? उस जन प्रतिनिधि शैक्षणिक योग्यता क्या है? कौनसे वर्ष में, किस विश्वविद्यालय से, कौनसी डिग्री प्राप्त की है, आदि।
लेकिन इस संशोधन के बाद सरकार अब डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट के तहत इस जानकारी को व्यक्ति की निजी सूचना और प्राइवेसी से सम्बंधित बताकर देने से मना भी कर सकती है। यह संशोधन सरकारी विभागों के लिए व्यक्तिगत जानकारी उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी को समाप्त करके सूचना के अधिकार अधिनियम को कमजोर करता है, भले ही वह जानकारी सार्वजनिक हित में हो और प्राइवेसी के अधिकार से ज्यादा ज़रूरी हो।
पारदर्शिता होगी प्रभावित
आज से पहले RTI सरकार और प्रशासन के सामने आम जनता का हथियार था। इसी से पारदर्शिता बनी हुई थी। पिछले दो दशकों में RTI के माध्यम से ही कई तरह के घोटालों और भ्रष्टाचारों की पोल खुली थी। पहले इसी के माध्यम से ठेकेदारों की जानकारी, योजना के लाभार्थियों की सूची, बैंक डिफाल्टर्स, आदि कामों से जुड़े हुए भ्रष्टाचार सामने आए थे, लेकिन अब संशोधन के बाद संभव है कि निजता की सुरक्षा का हवाला देकर ये सूचना आपको न दी जाए।
हालाँकि, सरकारी अधिकारियों ने कहा है कि ये संशोधन केवल निजी गोपनीयता बनाये रखने के लिए किया गया है। अन्य सरकारी और प्रशासनिक कार्यों के लिए स्थिति पहले की तरह ही है। अभी भी सभी सरकारी कार्यों, निविदाओं और ठेकों से सम्बंधित विभागीय सूचना उपलब्ध करवाई जाएगी। लेकिन संभव है कि इसकी आड़ में जो जानकारी प्रशासनिक अक्षमता को बाहर निकलने के लिए ज़रूरी है, उसे भी निजी या गोपनीय कहकर छिपा दिया जाए।
आज के समय में निजता और गोपनीयता आवश्यक है, लेकिन यदि गोपनीयता बनाये रखने से पारदर्शिता कम हो जाये, तो खतरा बन सकता है। इस वक़्त प्राइवेसी और ट्रांसपेरेंसी, दोनों के संतुलन की ज़रुरत है। एक भी कम हो जाए, तो इसका असर स्वतंत्रता छिनने के बराबर होगा।
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