Trump ने Greenland पर क्यों ढीले किए तेवर: यूरोप की सख्ती से पीछे हटे या हुई कोई सीक्रेट डील? टैरिफ भी हटाया और आर्मी भी. क्यों?

Trump U-Turn on Greenland and Tariffs on EU Countries: ग्रीनलैंड को लेकर अपने आक्रामक हो रहे डोनाल्ड ट्रंप के बर्ताव में अचानक बहुत बड़ा बदलाव हो चुका है। अभी, कुछ दिनों पहले ही ट्रम्प ग्रीनलैंड को हर हाल में हथियाने की बात कह रहे थे। यहां तक कि सैन्य कार्रवाई की धमकी भी आ चुकी थी और ग्रीनलैंड का साथ देने वाले और बचाने वाले देशों पर 1 फ़रवरी से एक्स्ट्रा टैरिफ लगाने की भी घोषणा हो चुकी थी, लेकिन अब उन्होंने साफ कर दिया कि ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने के लिए मिलिट्री ताकत का इस्तेमाल नहीं किया जायेगा। साथ ही, यूरोपीय देशों पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ भी वापस ले लिए।
यह बदलाव स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान 21 जनवरी को दिए गए ट्रम्प के 75 मिनट के भाषण में सामने आया। सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ, कि ट्रंप इतनी जल्दी अपनी बात से पलट गए? क्या यूरोप ने ट्रम्प को झुका दिया या कोई छिपी हुई डील हुई है? आइये जानते हैं पूरी कहानी-
यह बदलाव होने के पीछे की वजह को लेकर दो बड़ी अटकलें लगाई जा रही है। पहली है यूरोपियन देशों द्वारा ट्रेड डील रोक देना।
शुरुआती रणनीति में ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया था। ट्रम्प के अनुसार, ग्रीनलैंड के इलाके में रूस और चाइना अपनी जगह बनाना चाह रहे थे, जिससे अमेरिका की सुरक्षा को ख़तरा हो सकता था। इसलिए अमेरिका का ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करना ज़रूरी है। लेकिन एक पुराने कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार, ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है। साथ ही, ट्रम्प की इस हरकत से NATO के देश भी अमेरिका के विरोध में आ गए और अपने सैनिक ग्रीनलैंड में भेज दिए।
अमेरिका का ग्रीनलैंड पर सीधा हमला कर देना, NATO के आर्टिकल 5 के चलते खतरनाक था। संयुक्त राष्ट्र चार्टर भी एकतरफा हमले को अवैध ठहराता है। इसलिए ट्रम्प ने डेनमार्क और यूरोपीय संघ के अन्य देशों पर दबाव बनाने के लिए उन पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया था और इसे 25% तक बढ़ाने की भी धमकी दी।
लेकिन यूरोपियन देशों ने भी ट्रंप की धमकियों का कड़ा जवाब दिया। यूरोपीय संसद ने अमेरिका के साथ जुलाई 2025 में हुई ट्रेड डील 'टर्नबेरी डील' को रद्द करने की घोषणा कर दी। संसद में अमेरिकी सामानों पर इम्पोर्ट ड्यूटी हटाने के बात चल रही थी, जो ट्रंप के ही पक्ष में थी, और इस पर जल्द ही वोटिंग भी होने वाली थी। लेकिन ट्रम्प द्वारा बीच में ही टैरिफ लगाने के चलते अब इसको रोक दिया गया है। संसद की व्यापार समिति के अध्यक्ष बर्न्ड लांगे ने कहा कि ट्रंप के नए टैरिफ ने डील को तोड़ दिया है।
इसके अलावा, यूरोपीय देश अब अमेरिका से इम्पोर्ट पर जवाबी टैरिफ लगाने या एंटी-कोर्सियन इंस्ट्रूमेंट के उपाय अपनाने पर विचार कर रहे हैं, जिससे अमेरिकी सामानों पर बैन लग सकता है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने दावोस में ट्रंप की नीतियों की आलोचना की और कहा कि ऐसे दबाव से वैश्विक गठबंधन कमजोर होंगे।
इसके अलावा ट्रंप के बदलाव की दूसरी बड़ी वजह ये है कि ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को लेकर NATO और EU से एक डील कर ली है। ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर बताया कि उनकी NATO महासचिव मार्क रूट से गंभीर बातचीत हुई है, जिसके बाद आर्कटिक क्षेत्र में भविष्य में होने वाली डील्स के लिए ढांचा तैयार किया गया है। अगर यह प्लान सही हुआ, तो अमेरिका और नाटो, दोनों के लिए अच्छा होगा और टैरिफ भी नहीं लगेगा।
सूत्रों के अनुसार, इस डील से अमेरिका को ग्रीनलैंड के कुछ हिस्सों पर कण्ट्रोल मिल सकता है, जिससे वहां पर अमेरिका का सैन्य अड्डा बना सकेगा। हालांकि, डील की पूरी जानकारी अभी नहीं दी गई है। लेकिन कयास लगाये जा रहे हैं कि ट्रम्प को अपनी मर्ज़ी की डील मिल चुकी है, इसलिए उनका रुख नर्म हो चुका है।
अमेरिका में भी ट्रंप की नीति का विरोध हो रहा है। एक सर्वे के अनुसार, सिर्फ 17% लोग ग्रीनलैंड पर कब्जे के पक्ष में हैं। वैश्विक स्तर पर भी एंटी-ट्रंप की भावनाएं बढ़ रही है। कई जगहों पर ट्रम्प के खिलाफ प्रदर्शन भी किये गए। पेंटागन की रिपोर्ट में रूस और चीन को खतरा बताया गया है, जो अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं।
ट्रंप का यह कदम दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक फायदे के आगे मजबूत से मजबूत नेता भी झुक सकते हैं। अब देखना है कि यह डील कितनी सफल होती है और वैश्विक संबंधों पर इसका क्या असर पड़ता है। क्या ग्रीनलैंड को लेकर स्थिति सामान्य हो जाएगी या फिर वापस से कोई टैरिफ वॉर या इकनोमिक वॉर शुरू होगी। अब इसका फैसला तो आने वाला वक़्त ही करेगा।
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