US-China Trade war: अमेरिका–चीन ट्रेड वॉर, क्या होगा भारत पर असर, जानें पूरा सच

US China Trade War: दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियाँ—अमेरिका और चीन—एक बार फिर आमने-सामने हैं। और टकराव की वजह, पहले की तरह, सिर्फ व्यापार नहीं… बल्कि वर्चस्व की लड़ाई है। डॉलर बनाम युआन, टेक्नोलॉजी बनाम सप्लाई चेन और सुपरपावर बनाम सुपरपावर का वर्चस्व। लेकिन इस बार हालात और पेचीदा हैं, क्योंकि अमेरिका ने नए हाई-इम्पैक्ट टैरिफ़ लगाए हैं जिनकी गूँज अब सिर्फ वॉशिंगटन और बीजिंग तक नहीं, बल्कि दिल्ली तक सुनाई दे रही है। अमेरिका ने 2025 में अपने आयात टैरिफ को लेकर जो बड़े फैसले किए हैं, उनमें सबसे ज़्यादा असर टेक प्रोडक्ट्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरीज़, सोलर इक्विपमेंट, स्टील और सेमीकंडक्टर्स पर दिख रहा है। अमेरिका का दावा है कि चीन (China) इन सेक्टर्स में ओवर-प्रोडक्शन कर दुनिया भर के बाजारों को सस्ता सामान देकर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका इसे “अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस” कह रहा है और जवाब में 50% तक के टैरिफ कई उत्पादों पर लागू कर दिए गए हैं।
भारत पर Trade War का क्या असर?
दरअसल, अमेरिका–चीन ट्रेड वॉर का हर दौर दुनिया की सप्लाई चेन को हिलाकर रख देता है। और भारत, जो तेज़ी से उभरती हुई मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस इकॉनमी बन रहा है, वो इस पूरी लड़ाई में नया खिलाड़ी भी है और संभावित लाभार्थी भी।
किसे हो रहा नुकसान?
चीन पर भारी टैरिफ (US Impose Tarrif on China) लगने से अमेरिका वैकल्पिक बाजार ढूंढने की कोशिश में है और कई सेक्टर्स में भारत, चीन की सप्लाई चेन का हिस्सा है। जैसे—मोबाइल पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा APIs, मेटल और सोलर इक्विपमेंट। ये सामान अमेरिका में पहुँचने से पहले चीन से भारत और अमेरिका की सप्लाई चेन से होकर जाता है। जब चीन पर टैरिफ बढ़ते हैं, अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर भी लागत बढ़ती है। इससे भारतीय एक्सपोर्टर ज्यादा कीमत पर सामान बेचने को मजबूर होते हैं और अमेरिका के बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ती है।
महंगा हो रहा कच्चा माल
भारत कई उद्योगों के लिए चीन से कच्चा माल आयात करता है। जैसे—EV बैटरी सेल, सोलर पैनल, टॉय, इलेक्ट्रॉनिक्स। अमेरिका की पॉलिसी का असर ये होता है कि चीन अपनी भरमार प्रोडक्शन को एशिया में डंप करना शुरू कर देता है। यानी भारत में सस्ता सामान आने लगता है, जिससे भारतीय निर्माताओं पर दबाव बढ़ जाता है। सरकार को इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ानी पड़ती है… और इसका सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट और रोजगार पर पड़ता है।
किसे मिल रहा फायदा?
अमेरिका और चीन की लड़ाई ने भारत को एक बड़ा अवसर भी दिया है जिसे “China Plus one” रणनीति कहा जाता है। अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियाँ अब चीन पर निर्भरता कम कर भारत में निवेश कर रही हैं—खासकर मोबाइल, सेमीकंडक्टर, ऑटो और डिफेंस सेक्टर में। Apple जैसी कंपनियाँ उत्पादन भारत में शिफ्ट कर रही हैं। अमेरिका ने भी कई उत्पादों पर भारत को प्रेफरेंशियल ट्रेड टर्म्स देने का संकेत दिया है, ताकि चीन के विकल्प के रूप में भारत को मजबूत बनाया जा सके।
इसका सीधा फायदा—भारत का एक्सपोर्ट बढ़ सकता है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।
और सप्लाई चेन में भारत की स्थिति और मजबूत हो सकती है।
क्या है इनकी पॉलिटिक्स?
भारत को अभी भी इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक कॉस्ट और टेक्नोलॉजी गैप जैसे बड़े मुद्दे सुलझाने होंगे। तभी भारत चीन की जगह वास्तव में एक बड़ी वैश्विक फैक्ट्री बन पाएगा।
अमेरिका–चीन टकराव का तीसरा और सबसे दिलचस्प पहलू—जियोपॉलिटिक्स है।
अमेरिका चाहता है कि एशिया–पैसिफिक में चीन को काउंटर करने के लिए भारत बड़ा रोल निभाए। इसलिए Indo-Pacific Economic Framework से लेकर Quad तक—अमेरिका लगातार भारत को अपने साथ जोड़ रहा है और टैरिफ पॉलिसीज़ भी उसी बड़ी रणनीति का हिस्सा हैं। दूसरी तरफ, चीन भारत को एक उभरती चुनौती की तरह देखता है और इसीलिए सप्लाई चेन में भारत के बढ़ते रोल को लेकर पहले से सतर्क है।
अमेरिका के टैरिफ की मार चीन पर जरूर है, लेकिन सरकती हुई छाया भारत पर भी पड़ रही है। अब यहां नुकसान भी हैं, मौके भी हैं, चुनौतियां भी हैं और एक अवसर भी कि भारत 21वीं सदी की नई वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी जगह बना सकें और ये लड़ाई तय करेगी कि आने वाले सालों में दुनिया की आर्थिक शक्ति किस दिशा में जाएगी- पूर्व की ओर, पश्चिम की ओर या फिर भारत की ओर।
इस लिंक को शेयर करें