मोती डूंगरी की ऐसी कौन-सी परंपरा जो 42 साल बाद फिर शुरू हुई? भक्तो से भर गया मंदिर!

मोती डूंगरी की ऐसी कौन-सी परंपरा जो 42 साल बाद फिर शुरू हुई? भक्तो से भर गया मंदिर!
जयपुर
28 Mar 2026, 07:17 pm
रिपोर्टर : Dushyant

Moti Doongri Chyawanprash Bhog: जयपुर का मोती डूंगरी मंदिर यहाँ के लोगो के प्रिये मंदिरो में से एक माना जाता है. नयी गाड़ी का पूजन कराना हो या शादी का निमंत्रण देना हो भक्तो के दिमाग में पहला नाम मोती डूंगरी के गणपति जी का ही आता है. हलाकि प्रदेश में गणेश जी के कई मंदिर है पर शहर के बीच में होने कारन यह लोगो के लिए और भी खास हो जाता है यही नहीं कहा जाता की इस मंदिर का उट्घाटन 1761 में हुआ जिसमे भगवन गणेश की सदियों पुराणी मूर्ति की स्थापना की गयी जो मेवाड़ से मंगवाई गयी थी. यही नहीं, हर साल गणेश चतुर्थी पर यहाँ लाखों की तादाद में श्रद्धालु अपनी हाजरी देते हैं. और आज पुष्य नक्षत्र के पावन अवसर पर मोती डूंगरी मंन्दिर में एक ऐसी रीत दुबारा शुरू हो रही है जिसका इतिहास 42 साल पुराना है . मान्यता है कि यहाँ पर पुष्य नक्षत्र में बघवान को भोग के रूप में च्यवनप्राश जाता था जिसमे कई बूटियों के मिश्रण से तैयार किया जाता था.

क्या है इस परंपरा का महत्व ?

यह परंपरा महंत परिवार और मंदिर के पुजारियों द्वारा शुरू की गयी थी. जिसमे गजानन को पुष्य नक्शत्र में च्यवनप्राश का भोग लगया जाता था.वह मानते थे इस नक्षत्र में भगवन को जड़ीबूटीओ और औशदी का भोग लगाने से वह प्रसन्न होते है और लम्बी आयु का वरदान देते है. लेकिन कुछ कारन की वजह से इसे बंद करदिया गया लेकिन यह परंपरा कभी भी उनके मैं से नहीं गयी और आज इसे मेहनत परिवार के कैलाश शर्मा ने पुनर जीवंत कर दिया है.

इस साल चवंप्रश के भोग को त्यार करने में 35 प्रकार की औषदि और जड़ी बुटिया जैसे अमला, अश्वगंधा,, शतावरी और ब्राह्मी मिलायी गयी है और विशेष बात तो ये है की इसे किसी भी मौसम में खाने योगये बनाया गया है. और आज मोदकों के साथ भक्तजनों में इसका प्रसाद भी बांटा जाएगा।

क्या है पुष्य नक्षत्र?

पुष्य नक्षत्र,वैदिक ज्योतिष शास्त्र में 27 चंद्र नक्षत्रों में से आठवां नक्षत्र है और कर्क राशि में स्थित है, इसका इसका अर्थ है "पोषण करना". इस नक्षत्र को धन, समृद्धि और कामना पूर्ण करने वाला नक्षत्र माना जाता है. और गणपति बाप्पा विघ्नहर्ता और समृद्धि के दाता है इसलिए इस दिन गणपति का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है, और मोदकों का भोग लगाकर भगवन से सुख शांति, समृद्धि, लम्बी आयु और उन्नति की कामना करी जाती है.

जयपुर के मोती डूंगरी मंदिर में हुआ खास अभिषेक !

इस साल 28 मार्च 2026 को मोती डूंगरी में पुष्य नक्षत्र के पावन अवसर पर 251 किलो दूध, दही,घी ,बुरा और शहद से गणपति का अभिषेक किया गया. गणपति को गंगाजल, केवड़े के जल और गुलाब जल से निलहाया गया और 1001 लडूओं की झांकी कर प्रशाद चदया गया जिसे देखने कई जगह से भक्तजन आये.

Content - Ekta Sharma


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