Eco-Sensitive Zone में बेकाबू निर्माण से मौत का खतरा! हनुमान बेनीवाल ने पर्यावरण को लेकर सरकार को घेरा, मंत्री का जवाब 'बेअसर'

Hanuman Beniwal on Eco-Sensitive Zone and Nature Conservation: लोकसभा में उठाए गए एक बड़े सवाल ने पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन पर ज़बरदस्त बहस छेड़ दी है। नागौर से सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के अध्यक्ष हनुमान बेनीवाल ने केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से कुछ प्रश्न पूछे। बेनीवाल ने पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) में अनियंत्रित और गलत तरीके से किये जा रहे निर्माण और इसकी वजह से उठ रहे भूस्खलन जैसे संकटों पर सवाल उठाये। हनुमान बेनीवाल के उठाये गए सवालों पर मंत्रालय के राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने जवाब तो दिया, लेकिन बेनीवाल ने इसे अपर्याप्त बताया और सरकार की गंभीरता पर सवाल उठाया। बेनीवाल ने कहा कि मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह (Kirti Vardhan Singh) ने अपने जवाब से सिर्फ मूल विषय से भटकाने की कोशिश की है। (Ministry of Environment)
क्या अनियंत्रित निर्माण से पर्यावरणीय आपदाएं बढ़ रही हैं?
सांसद बेनीवाल ने अपने पहले सवाल में सरकार से पूछा - क्या सरकार मानती है कि अनियोजित निर्माण और अवैज्ञानिक ढांचे से हुआ विकास संवेदनशील इलाकों में पर्यावरण से जुड़े गंभीर संकट पैदा कर रहे हैं? उन्होंने जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में हाल की भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं का हवाला दिया, जिनसे हजारों लोगों को जान-माल की हानि हुई।
मंत्री सिंह ने इस पर सीधा जवाब न देते हुए ESA और ESZ (Eco-Sensitive Zone) के कॉन्सेप्ट पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन ख़ास इलाकों को 'शॉक एब्जॉर्बर' के रूप में डेवलप किया जाता है, जो उच्च सुरक्षा वाले इलाकों और कम सुरक्षित क्षेत्रों के बीच परिवर्तनशील इलाकों की तरह संतुलन बनाने का काम करते हैं। साथ ही, स्थानीय लोगों की विकास की इच्छाओं और उम्मीदों को ध्यान में रखते हुए यह वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता के लिए ज़रूरी है।
हालांकि, हनुमान बेनीवाल ने आरोप लगाया कि सरकार के जवाब में जिन नियमों का जिक्र है, उनकी खबर तो सभी को है, लेकिन उनकी पालना नहीं हो रही है। बेनीवाल का कहना है कि कीर्तिवर्धन सिंह ने जवाब तो दिया, लेकिन ऐसे खास इलाकों में पर्यटन के नाम पर बिजली के प्रोजेक्ट और अन्य विकास कार्यों के नाम पर मंत्रालय ने जो निर्माण करने की परमिशन दी है, उनकी जानकारी जवाब में नहीं दी गयी है। इसलिए कीर्तिवर्धन सिंह ने अपने जवाब में मूल विषय से भटकाने की कोशिश की है।
पिछले दशक में दी गई अनुमतियां क्या हैं?
दूसरे सवाल में बेनीवाल ने पिछले दशक में ESA क्षेत्रों में पर्यटन, पानी-बिजली की परियोजनाओं या अन्य विकास कार्यों के निर्माण कार्यों के लिए दी गई अनुमतियों का राज्यवार ब्योरा मांगा। मंत्री ने इस सवाल पर कोई ख़ास विवरण जवाब में पेश नहीं किया, बल्कि एक जोनल मास्टर प्लान की बात की, जिसे अधिसूचना के दो साल के भीतर तैयार करने का आदेश है।
यह प्लान illegal कामों, जैसे कमर्शियल माइनिंग, प्रमुख जल-विद्युत परियोजनाएं और प्रदूषण बढ़ाने वाले उद्योगों को कण्ट्रोल करता है और पर्यावरण के अनुकूल होने वाली कमाई के विकल्पों पर फोकस करता है।
बेनीवाल ने इसे सरकार की चालाकी बताते हुए कहा कि मंत्रालय जानबूझकर उन अनुमतियों की जानकारी छिपा रहा है। ये साफ़ दिखा रहा है कि सरकार विकास के नाम पर विनाश को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं से पर्यावरण के साथ-साथ इंसानों का जीवन भी खतरे में पड़ रहा है।
राष्ट्रीय नीति बनाने की क्या योजना है?
बेनीवाल ने अपने तीसरे और चौथे सवाल में पूछा कि क्या सरकार संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण और पर्यावरण का नुकसान रोकने के लिए कोई राष्ट्रीय नीति बनाएगी? यदि हां, तो कब तक? और यदि नहीं, तो क्यों?
कीर्तिवर्धन ने अपने जवाब में जोखिम भरी पहाड़ी ढलानों पर निर्माण पर रोक और निगरानी समितियों का ज़िक्र किया, लेकिन कोई नई नीति बनाने की बात या समयसीमा नहीं बताई। बेनीवाल ने कहा कि ये सरकार की लापरवाही और काम ना करने की मंशा को सामने रख रहा है। उन्होंने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति के बचाव को प्राथमिकता देकर ही किसी योजना को मंजूरी मिलनी चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि हाल ही में हुई कई आपदाओं से सबक लेते हुए हमें सावधानी बढ़ानी होगी, वरना और बड़ी प्राकृतिक आपदाएं आ सकती हैं।
यह बहस अब पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच भी चर्चा का विषय बन गयी है और प्रकृति के साथ संतुलित विकास की मांग तेज हो रही है। बेनीवाल द्वारा इन आरोपों को लगाने के बाद फ़िलहाल तक सरकार की तरफ से आगे कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है।
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