Bihar Election 2025: NDA की प्रचंड जीत की कहानी सीआर पाटील की रणनीति और सूरत के बिहारियों का कमाल

सूरत का नाम जब-जब आता है तब-तब टेक्सटाइल, डायमंड पॉलिशिंग का काम या इन का बिजनेस की तस्वीर सामने आती है। वैसे तो गुजरात के सूरत ने भारत ही नहीं अपितु पुरे विश्व में अपनी छाप छोड़ दी है। लेकिन इस छाप के पीछे एक तस्वीर ऐसी भी है जो कभी नजर नहीं आती है, या यु कहे की उनकी महारथ पर कोई बात नहीं करता है।
ये बात है बिहार से आये उन कामगारों की जो अपने सपनों की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर दूर गुजरात आते है। पीढ़ियों से बिहारी परिवार यहां अपना भविष्य बनाने आते रहे हैं, और इसी ने बिहार व गुजरात के बीच एक रिश्ता तैयार कर दिया है। लेकिन इस साल, इस रिश्ते ने कुछ ऐसा कर दिखाया जो पहले कभी नहीं हुआ। गुजरात से 1,700 किलोमीटर दूर एक चुनाव को प्रभावित कर दिया।मोदी की रैली में गूंजे बिहारियों के स्वर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। इस जनसभा की खासियत भीड़ का आकार नहीं था। , बल्कि यहां मौजूद भीड़ में बड़ी संख्या उन बिहारियों की थी, जो अब गुजरात को अपना दूसरा घर मानते हैं।
जैसे ही पीएम मोदी ने बिहार में आए परिवर्तन का ज़िक्र किया, उनकी आवाज़ पर बिहारियों का उत्साह और तालियां गूंज उठीं।
मोदी ने कहा कि बिहार की माताओं, बहनों और युवाओं ने आने वाले दशकों की राजनीति की नींव रख दी है। इस चुनाव ने जातिवाद और साम्प्रदायिक राजनीति को नकार दिया। बिहार ने पूरे देश को एक संदेश दिया है।
गुजरात में रहने वाले इन लोगों के लिए यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि उनकी दोहरी पहचान की मान्यता थी। गुजरात में रहकर भी बिहार के विकास में भूमिका निभाने का गर्व।
बिहार में NDA ने प्रचंड जीत दर्ज की है साथ ही बीजेपी ने 89 सीट दर्ज करने में भी कामयाबी हासिल की है इन सब के पीछे एक नाम सामने आता है वो है सीआर पाटील, जिन्होंने पर्दे के पीछे रह कर NDA का सफल बनाने का काम किया है
सूरत के नजदीक नवसारी से आने वाले पाटील गुजरात बीजेपी संगठन के सबसे सफल रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। उनके नेतृत्व में गुजरात बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में 181 में से 156 सीटें जीती थीं।
बिहार चुनाव के लिए उन्हें सह-प्रभारी बनाया गया, और सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र—78 सीटें, जिनमें सीमांचल भी शामिल था, उनके जिम्मे दिए गए।
सीमांचल ऐसा क्षेत्र है जहां जाति, समुदाय और स्थानीय समीकरण चुनावों को बेहद अनिश्चित बना देते हैं। लेकिन पाटील ने वही किया जिसके लिए वे जाने जाते हैं, बेहतरीन मैनेजमेंट।
पाटील ने गुजरात का ‘पेज कमेटी मॉडल’ पहली बार बिहार में अप्लाई किया , जिसमें हर मतदाता का रिकॉर्ड रखा गया और उनसे नियमित संपर्क किया गया, ये पहली बार बिहार में लागू किया गया।
यह एक साहसी कदम था, क्योंकि बिहार का चुनावी भूगोल गुजरात से काफी अलग और अधिक जटिल है। लेकिन पाटील और उनकी टीम को भरोसा था कि यह मॉडल यहां भी काम करेगा।
1,200 से ज्यादा गुजरात बीजेपी कार्यकर्ता बिहार पहुंचे—इनमें अधिकतर वही प्रवासी बिहारी थे जो सालों पहले गुजरात में बस गए थे।
वे सिर्फ वोट डालने नहीं आए थे, बल्कि पार्टी के जमीनी संगठन में अहम भूमिका निभाने आए थे।
वे गांव-गांव जाकर मैनेजमेंट करते। मतदाताओं की लिस्ट अपडेट की, बूथ स्तर के आंकड़े जुटाए, सीटों को A, B, C, D कैटेगरी में बांटा, और प्रत्येक सीट के लिए अलग रणनीतियां बनाई।
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