वोट 35%, बोर्ड 66%...आखिर BJP ने ऐसा क्या किया? क्या रहा गेम प्लान?

वोट 35%, बोर्ड 66%...आखिर BJP ने ऐसा क्या किया? क्या रहा गेम प्लान?
राजनीति
22 Sept 2026, 02:42 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

राजस्थान के निकाय चुनाव में पार्षदों के नतीजे आने के बाद कहानी एकतरफा नहीं थी। बीजेपी को करीब 35 फीसदी वोट मिले, कांग्रेस को 34.24 फीसदी… यानी दोनों के बीच वोट शेयर का अंतर एक फीसदी से भी कम था। लेकिन जब बात आई मेयर और चेयरमैन की कुर्सी की, तो तस्वीर पूरी तरह बदल गई।

घोषित नतीजों में बीजेपी ने 301 निकायों में 197 अध्यक्ष पद अपने नाम किए, जबकि कांग्रेस 94 पर रही। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि बीजेपी साम,दाम,दंड, भेद का इस्तेमाल कर रही है, कि बीजेपी ने पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल कर पार्षदों पर दबाव बनाया। अशोक गहलोत और गोविंद सिंह डोटासरा समेत कांग्रेस नेताओं ने ऐसे आरोप लगाए हैं। बीजेपी ने इन आरोपों को राजनीतिक आरोप बताया।

यानी असली खेल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि बोर्ड बनाने की रणनीति का था। तो बीजेपी की वो कौन-सी 5 रणनीतियां थीं, जिनसे उसने कई जगह कांग्रेस के हाथ से बाजी छीन ली?

पहली रणनीति- निर्दलीयों को साधना

इस चुनाव में निर्दलीय पार्षद बड़ी ताकत बनकर उभरे। भरतपुर जैसे निकाय में निर्दलीय सबसे बड़ा गुट रहे। जहां किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, वहां ये पार्षद बोर्ड बनाने में निर्णायक हो गए। बीजेपी ने ऐसे समीकरणों में समर्थन जुटाने पर जोर दिया।

दूसरी रणनीति- क्रॉस वोटिंग का गणित

अजमेर, पाली, अनूपगढ़ और पिंडवाड़ा जैसे नतीजे बताते हैं कि पार्षदों की संख्या और अध्यक्ष पद के वोट हमेशा एक जैसे नहीं रहे। अजमेर में कांग्रेस के पास बीजेपी से ज्यादा पार्षद थे, फिर भी बीजेपी की अनामिका शर्मा मेयर बन गईं। पाली में तो कांग्रेस के 29 पार्षद थे, लेकिन अधिकृत उम्मीदवार को सिर्फ 3 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार को 33 वोट मिले। गुप्त मतदान होने की वजह से व्यक्तिगत तौर पर किसने किसे वोट दिया, ये तय नहीं कहा जा सकता, लेकिन नतीजे ने क्रॉस-वोटिंग की चर्चा जरूर तेज कर दी।

तीसरी रणनीति- बाड़ेबंदी और फ्लोर मैनेजमेंट

बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने पार्षदों को अपने खेमे में बनाए रखने के लिए बाड़ेबंदी की। लेकिन बीजेपी ने अध्यक्ष पद के मतदान तक अपने पार्षदों की एकजुटता बनाए रखने और संभावित सेंधमारी रोकने पर खास जोर दिया। जयपुर में भी बीजेपी ने अपने 78 पार्षदों को एकजुट रखने के लिए बाड़ेबंदी की।

चौथी रणनीति- स्थानीय स्तर पर आखिरी वक्त का मैनेजमेंट

निकाय चुनाव में प्रदेश स्तर की राजनीति से ज्यादा अहम हो जाता है स्थानीय समीकरण। कौन पार्षद किस नेता के संपर्क में है, कौन नाराज है, किस निर्दलीय का किस गुट से समीकरण है—यही अध्यक्ष चुनाव का असली गणित बना।

अब देखिए नागौर में बीजेपी के 21 पार्षद थे, लेकिन उसके प्रत्याशी को 55 वोट मिले। अनूपगढ़ में बीजेपी के सिर्फ 7 पार्षद थे, लेकिन उसके उम्मीदवार को 20 वोट मिले। ऐसे नतीजे बताते हैं कि आखिरी वक्त में समर्थन जुटाने की रणनीति कई जगह निर्णायक रही।

पांचवीं रणनीति- कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान का फायदा

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कई जगह अपने ही खेमे को एकजुट रखने की रही। पाली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां कांग्रेस की अधिकृत उम्मीदवार और पार्टी से जुड़ी बागी उम्मीदवार के बीच मुकाबला हो गया और आखिरकार बीजेपी ने 33 वोट लेकर मेयर की कुर्सी हासिल कर ली। गंगापुर में भी कांग्रेस के स्पष्ट बहुमत के बावजूद अध्यक्ष पद को लेकर पार्टी के भीतर बगावत सामने आई।

यानी इस निकाय चुनाव की कहानी सिर्फ किस पार्टी ने कितने पार्षद जीते, इतनी भर नहीं है। बीजेपी ने जहां निर्दलीयों का समर्थन, क्रॉस-वोटिंग के समीकरण, बाड़ेबंदी और स्थानीय फ्लोर मैनेजमेंट पर जोर दिया, वहीं कांग्रेस के सामने बगावत, प्रत्याशी चयन और संगठनात्मक तालमेल जैसी चुनौतियां कई जगह खुलकर सामने आईं। और यही वजह है कि करीब 35 बनाम 34 फीसदी वोट शेयर की बेहद करीबी लड़ाई, अध्यक्ष पदों के नतीजों में बीजेपी के पक्ष में कहीं ज्यादा बड़ी बढ़त में बदल गई।

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