SUN, 30 NOVEMBER 2025

राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला: स्थानीय निकाय चुनाव 15 अप्रैल 2026 से पहले, परिसीमन 31 दिसंबर तक पूरा करने का आदेश

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राजस्थान
14 Nov 2025, 06:41 pm
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रिपोर्टर : Dushyant

राजस्थान हाई कोर्ट ने स्थानीय निकायों के चुनाव में हो रही देरी को लेकर बड़ा फैसला किया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ ने जनहित याचिकाओं पर फैसला लेते हुए पंचायतों और शहरी निकायों के चुनाव 15 अप्रैल 2026 से पहले करवाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने 31 दिसम्बर तक सभी निकायों के परिसीमन प्रक्रिया को पूरा करने का आदेश भी दिया। हाई कोर्ट ने 12 अगस्त को हुई सुनवाई में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो अब तीन महीने बाद सुनाया गया है। याचिकाएं गिरिराज सिंह देवंदा, पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर की गयी थी।


सरकार द्वारा चुनाव की तारीख आगे बढ़ाना अवैध

याचिकाओं में तर्क दिया गया था कि इस वक़्त राजस्थान में 6,759 पंचायतों और 55 नगर पालिकाओं का कार्यकाल ख़त्म हो चुका है। संवैधानिक नियमों के तहत पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद चुनाव में एक दिन की भी देरी नहीं की जा सकती। राज्य सरकार द्वारा मनमाने ढंग से चुनाव कराने में देरी करना और चुनाव की तारीख आगे बढ़ाना संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। इस कारण से और बिना ज्यादा देर किये चुनाव सुनिश्चित करवाने के लिए न्यायालय से हस्तक्षेप का अनुरोध किया गया था। इस प्रकार की लगभग 450 याचिकाएं हाई कोर्ट को प्राप्त हुई थी।


याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधि अधिवक्ता प्रेमचंद देवंदा ने दलील दी कि राजस्थान सरकार द्वारा 16 जनवरी 2025 को एक अधिसूचना जारी कर ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ योजना के तहत पंचायती और स्थानीय निकाय के चुनावों को स्थगित कर दिया था। इस प्रकार का स्थगन संविधान के अनुच्छेद 243 (E) और 243 (K) तथा राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 17 का उल्लंघन करता है। देवंदा ने कहा कि इस प्रकार देरी करके सरकार ने लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई को अस्थिर बना दिया है।


पूर्व विधायक संयम लोढ़ा द्वारा दायर जनहित याचिका में अधिवक्ता पुनीत सिंघवी ने दलील दी कि नियमों के तहत कार्यकाल पूरा होने के बाद चुनाव किसी भी स्थिति में स्थगित नहीं किये जा सकते। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार केवल प्राकृतिक आपदाओं जैसी गंभीर परिस्थितियों के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्थिति में चुनाव को स्थगित करने का प्रावधान नहीं है।


प्रशासकों की नियुक्ति नियमों का उल्लंघन है

वकीलों ने बताया कि जिन पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, उन पंचायतों में उन्हीं सरपंचों को फिर से प्रशासक के तौर पर नियुक्त कर दिया गया है। कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद सरपंच जन प्रतिनिधि नहीं रहता, सिर्फ एक निजी व्यक्ति अथवा सामान्य नागरिक रह जाता है। इसलिए उन्हें प्रशासक नियुक्त करना पूर्ण रूप के क़ानून के विरुद्ध है।


इसी प्रकार 55 नगरपालिकाओं में भी कार्यकाल नवम्बर 2024 को ही समाप्त हो चुका है। इन पालिकाओं में भी सरकार ने चुनाव न करवाकर अवैध रूप प्रशासक नियुक्त किये हैं। यह नियुक्ति भी संवैधानिक प्रावधानों और राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 का उल्लंघन है।


राज्य सरकार के बचाव के तर्क

राज्य सरकार ने अपने बचाव में कोर्ट में तीन तथ्य सामने रखे। सरकार ने कहा कि इस समय वह ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ मॉडल पर काम कर रही है। स्थानीय शासन को सुदृढ़ बनाने और समय व संसाधनों को बचाने के लिए जाँच हेतु एक उच्च-स्तरीय समिति का प्रस्ताव रखा गया था।


प्रदेश सरकार ने कहा की पिछली सरकार द्वारा नए जिले बनाये जाने के बाद भी परिसीमन कार्य पूरा नहीं हुआ था। जिसके बाद वर्तमान सरकार ने पुनः नौ जिलों को समाप्त कर दिया था। इसके कारण अभी तक भी नए क्षेत्र का परिसीमन कार्य पूर्ण नहीं हुआ है। ऐसे में चुनाव आगे के लिए स्थगित करना ज़रूरी था।


सरकार ने अपनी सफाई में दलील दी कि पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 95 के तहत राज्य सरकार को प्रशासक नियुक्त करने का कानूनी अधिकार है। साथ ही अधिनियम में यह विशेष तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया है कि कौन प्रशासक का पद धारण कर सकता है और कौन नहीं।


सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद और SIR और निकायों के परिसीमन को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने 15 अप्रैल तक चुनाव करवाने का आदेश जारी किया। साथ ही राज्य सरकार को नवगठित क्षेत्रों का परिसीमन दिसम्बर 2025 तक पूर्ण करने का आदेश दिया।


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