Banswara: 500 साल का श्राप! आधी रात को लड़कों की आपस में शादी!

Banswara Marrigae Tradition: रात के ठीक एक बजे का मंजर- एक अनोखे गांव का, अंधेरी रात की खौफ पैदा करने वाला सन्नाटा और इस सन्नाटे को चीरते हुए जब दो छोटे-छोटे लड़कों को कुछ लोग पकड़कर उनके हाथ में मेहंदी और हल्दी लगाकर आग के सामने बिठाते हैं और शादी करा दी जाती है। एक लड़का दूल्हा बना है और दूसरा लड़का दुल्हन बनता है। इस मंजर को देखकर किसी की भी रुह कांप जाए। लेकिन डरिए मत, ये कोई हॉरर स्टोरी का सीन नहीं बल्कि एक परंपरा का किस्सा है जो आज भी राजस्थान के एक गांव में होता है और ये गांव है बांसवाड़ा में इस गांव का नाम है बड़ोदिया, जो बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से 44 किलोमीटर की दूरी पर है। लेकिन यहां ऐसा क्यों होता है? क्यों दो लड़कों की शादी कराई जाती है? तो इसकी वजह है गांव को मिला एक श्राप जो आजकल का नहीं बल्कि 500 साल पुराना है।
क्या है 500 साल पुराना वो श्राप?
यहां के गांव वालों का कहना है कि उनके गांव को 500 साल पहले खेर जाति का श्राप लगा था। ऐसा कहा जाता है कि तब यहां खेर जाति का शासन था। इन्हें गोल पटेल समाज ने एक सिद्ध बाबा की मदद से विस्थापित कर दिया था जिससे गुस्साए खेर जाति के लोगों ने जाते समय खेर मुखिया ने गांव को उजाड़ने का श्राप दिया था। इसके बाद गांव के सैकड़ों पालतू जानवरों की जान चली गई थी। ऐसा माना जाने लगा था कि ये मौतें उसी श्राप की वजह से हो रहीं थीं। फिर गांव वालों ने इससे बचने के लिए तमाम सिद्ध लोगों से संपर्क किया और तब ये तय किया गया कि होली से एक दिन पहले गांव में दो लड़कों की शादी कराई जाए। बस इसीलिए गांव में आज भी आधी रात को दो मासूम लड़कों का प्रतीक के तौर पर शादी कराते हैं।
इस तरह होती है लड़कों की शादी
ये रस्म होली से एक रात पहले होता है रात को पूरा गांव एक जगह जुटता है। ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं और सोते हुए दो छोटे मासूम लड़कों को उठाकर ले जाया जाता है और उनकी शादी कराई जाती है। एक लड़का दूल्हा बनता है और दूसरा दुल्हन। हैरानी की बात ये है कि इस रस्म के लिए कोई भी दो लड़के नहीं चुन लिए जाते। शर्त ये है कि उनका यज्ञोपवीत संस्कार न हुआ हो। यानी जनेऊ पहन चुके लड़के इस परंपरा का हिस्सा नहीं बन सकते। इसके लिए गांव का गेरिया समूह इन दो लड़कों को ढूंढता है। पहले मिलने वाला लड़का—दूल्हा और दूसरा लड़का दुल्हन।
इन दोनों को कंधों पर बिठाकर मंदिर तक लाया जाता है। यहां असली रस्में शुरू होती हैं। मंदिर में मंडप सजा होता है। पंडित सारी विधि-विधान से मंत्र पढ़ते हैं। सारी वैदिक रस्में निभाई जाती हैं। यानी सात फेरे सात वचन, घूंघट, बारात और गांव की खुशी, सब कुछ बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी आम शादी में होता है। ये पूरी शादी आधी रात एक बजे के आसपास होती है। रातभर पूरा गांव नाचता-गाता है और फिर सुबह होते ही दोनों लड़कों को बैलगाड़ी में बिठाकर पूरे गांव में घुमाया जाता है। इसे वर-वधू की शोभायात्रा कहा जाता है। इन्हें गांव वाले आशीर्वाद भी देते हैं।
इस रस्म से पूरे देश में बड़ोदिया गांव फेमस हुआ
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि बांसवाड़ा का ये गांव एक समय गांव दो हिस्सों में बंटा था। एक नाले के दोनों तरफ दोनों हिस्सों में प्रेम और एकता बनाए रखने के लिए इस परंपरा की शुरुआत हुई और देखते ही देखते ये परंपरा गांव की पहचान बन गई...तो आज, जब दुनिया डिजिटल हो रही है। तब बड़ोदिया गांव अब भी अपने पूर्वजों के डर, आस्था और एकता की इस अनोखी विरासत को निभा रहा है। दो लड़कों की शादी—सुनने में अजीब ज़रूर लगे। लेकिन यहां ये परंपरा गांव की सुरक्षा, प्रेम और आस्था का प्रतीक मानी जाती है।
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