आरक्षण नहीं तो वोट नहीं: घुमंतू समुदाय ने राजस्थान निकाय और पंचायत चुनाव के बहिष्कार की दी चेतावनी

Jaipur: विमुक्त, घुमंतु एवं अर्ध घुमंतु (DNT) समुदाय की बदतर स्थितियों को लेकर पिंक सिटी प्रेस क्लब में बड़ी प्रेस वार्ता आयोजित की गई। इस दौरान समुदाय के प्रतिनिधियों ने सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाया और कहा कि उनकी 21 सूत्रीय मांगों, खासकर 10% अलग आरक्षण, को पूरा नहीं किया गया तो वे आगामी नगर निकाय और पंचायत चुनावों (Rajasthan Panchayat And Nikay Election 2026) का पूरी तरह बहिष्कार करेंगे। वहीं प्रेस वार्ता में पूर्व मंत्री और लोक सुराज रनके राष्ट्रीय संस्थापक अध्यक्ष गोपाल केसावत (Gopal Kaishawat) ने 11 फरवरी 2026 को जयपुर स्थित शहीद स्मारक पर विधानसभा घेराव का एलान किया।
हम नागरिक हैं या नहीं – समुदाय के तीखे सवाल
प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि DNT समुदाय आज भी बुनियादी पहचान और अधिकारों से वंचित है। न स्थायी आवास, न शिक्षा की सुविधा, न स्वास्थ्य सेवाएं, और कई स्थानों पर अंतिम संस्कार के लिए भूमि तक उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार हमें भारत का नागरिक मानती है या नहीं? क्या वे हमारी मानवीय गरिमा को स्वीकार करती है?
ब्रिटिशकालीन कानून से शुरू हुई उपेक्षा, आज तक जारी
DNT समुदायों को 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित किया गया था। आज़ादी के बाद 1952 में इन्हें विमुक्त तो कर दिया गया, लेकिन सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर आज भी इनके साथ संदिग्ध की तरह व्यवहार होने का आरोप वार्ता में लगाया गया। रेनके आयोग के मुताबिक पहले 198 समुदाय ‘जरायम पेशा’ घोषित थे, लेकिन समय के साथ टूट-फूट कर यह संख्या 1262 तक पहुंच गई है, जो देश की लगभग 10% आबादी है। राजस्थान में ऐसे करीब 32 समुदाय मौजूद हैं।
पुश्तैनी हुनर छीने गए, आजीविका संकट गहराया
इन समुदाय की पारंपरिक कारीगरी भी अब नहीं बची जैसे—ढोलक, बांसुरी, खिलौने और मूर्तियां, टोकरियाँ व बाँस फर्नीचर बनाना, कठपुतली, नाटक, सपेरागिरी, जादूगरी, इन सब पर आधुनिक बाजार और दूसरे समुदायों का कब्जा हो गया है जिसने इनकी आजीविका पूरी तरह बिगाड़ दी है। मजबूरी में कई लोग कूड़ा बीनने, अस्थायी मजदूरी या भीख मांगने तक को मजबूर हो गए हैं।
सरकारी योजनाओं से दूर क्यों?
क्योंकि ज्यादातर समुदाय स्थायी ठिकाने पर नहीं रहते, इसलिए इनका आधार कार्ड, राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, वोटर कार्ड जैसे दस्तावेज बनाना मुश्किल होता है। इसी वजह से सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाता।
6 आयोग और 2 दशक की रिपोर्टें ठंडे बस्ते में
समुदाय ने आरोप लगाया कि रेनके आयोग (2008) और इदाते आयोग (2018) की रिपोर्ट्स अब तक संसद में पेश नहीं की गईं। राजस्थान व केंद्र दोनों ने बोर्ड बनाए, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ।
इसे लेकर गोपाल केसावत ने कहा कि आरक्षण हमारी पहचान और अस्तित्व का सवाल है। अगर सरकार ने 10% आरक्षण की मांग नहीं मानी, तो DNT समुदाय आगामी निकाय और पंचायत चुनाव का पूरी तरह बहिष्कार करेगा। उन्होंने राजनीतिक दलों पर आरोप लगाया कि आजादी के बाद से DNT समुदाय को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया गया, लेकिन अधिकार नहीं दिए गए।
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