SUN, 30 NOVEMBER 2025

ब्राह्मण समाज की दान में लेने वाले आईएएस को बताया राजस्थान भाजपा के प्रभारी ने मूर्ख

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राजस्थान
28 Nov 2025, 04:19 pm
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रिपोर्टर : Ashish Bhardwaj

एक IAS अधिकारी द्वारा हाल ही में दिए गए विवादित बयान ने सामाजिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बड़ी बहस छेड़ दी है। आरक्षण जैसी संवेदनशील और संविधान प्रदत्त व्यवस्था पर उनकी अपरिपक्व और अनुचित टिप्पणी ने व्यापक आलोचना को जन्म दिया है। कई लोगों का कहना है कि यह बयान न केवल गलत समझ का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कुछ उच्च अधिकारियों को सामाजिक न्याय की बुनियादी अवधारणा की समझ अब भी अधूरी है।


डॉ राधा मोहन दास अग्रवाल ने कहा की


इस मूर्ख IAS अधिकारी को इतनी भी जानकारी नहीं है कि आरक्षण की व्यवस्था एक एफर्मेटिम व्यवस्था है तो सामाजिक विषमता दूर करने के लिए है।

ऐसी शर्मनाक टिप्पणियां यह बताती हैं कि आईएएस अधिकारियों को सही तरीके से ट्रेनिंग दी जाती है


आरक्षण किसी को ‘विशेषाधिकार’ नहीं देता, बल्कि सदियों की सामाजिक असमानता को कम करने का माध्यम है।






ऐसे में जब एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी आरक्षण जैसे विषय पर इस तरह की असंवेदनशील और अप्रासंगिक टिप्पणी करता है, तो यह स्पष्ट रूप से बताता है कि वह इस व्यवस्था के मूल उद्देश्य को समझने में विफल रहा है।


बयान से उपजा विवाद और जनता की नाराजगी


अधिकारी की टिप्पणी ने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक आक्रोश फैलाया। लोग इस बात से गुस्सा हैं कि जिस व्यक्ति को समाज की विविधताओं, संवेदनशीलताओं और नीतिगत व्यवस्था की समझ होनी चाहिए, वही ऐसी टिप्पणी कर रहा है।


क्या प्रशासनिक प्रशिक्षण में कमी है?


इस घटना ने प्रशासनिक प्रशिक्षण (Administrative Training) पर भी बड़ी बहस खड़ी कर दी है।


क्या हमारी प्रशासनिक अकादमियाँ नई पीढ़ी के अफसरों को सामाजिक न्याय, संवैधानिक व्यवस्था और ऐतिहासिक असमानताओं की वास्तविक समझ दे पा रही हैं? क्या प्रशिक्षण में संवेदनशीलता, सामाजिक जागरूकता और ज़मीनी हकीकतों पर पर्याप्त ज़ोर दिया जा रहा है? यह विवाद इस बात की ओर संकेत करता है कि नौकरशाही में सिर्फ पढ़ाई या परीक्षा पास कर लेना काफी नहीं, बल्कि सामाजिक समझ और संवेदनशीलता सबसे बड़ी आवश्यकता है।


अधिकारियों की जिम्मेदारी: समाज की एकता और सम्मान


एक IAS अधिकारी सिर्फ नीति लागू करने वाला कर्मचारी नहीं होता, बल्कि समाज में संतुलन बनाए रखने और संवैधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का वाहक होता है।

ऐसे में किसी भी उच्च पदस्थ अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह बोलने से पहले सोचें और समाज के हर वर्ग के सम्मान का ख्याल रखें।


इस तरह की टिप्पणियाँ न केवल नैतिक रूप से गलत हैं, बल्कि वे सामाजिक सद्भाव को भी चोट पहुँचाती हैं।


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