डिजिटल मीडिया के पत्रकारों के लिए क्या सरकार लाएगी नियम-कानून? सदन में उठी प्रोटेक्शन एक्ट की मांग

Journalist Protection Act: देश का चौथा स्तंभ माना जाने वाला मीडिया वो ताकत है जो सवाल पूछती है, सच दिखाती है और सत्ता के गलियारों से लेकर गांव की चौपाल तक हर आवाज़ को उठाती है। लेकिन ये विडंबना है कि जो पूरे देश को न्याय दिलाता है, वही पत्रकार खुद न्याय के लिए भटकता फिरता है। ऐसे में आज राजस्थान विधानसभा में पत्रकारों की वही जमीनी हकीकत फट पड़ी। वो दर्द, जो कैमरों में नहीं दिखता। विधानसभा में बीजेपी विधायक अशोक कुमार कोठारी ने पत्रकारों का दर्द सदन के बीच ला पटका। उन्होंने कहा कि पत्रकार असुरक्षा में काम कर रहे हैं, इसलिए इनके लिए पत्रकार प्रोटेक्शन बिल लाया जाए।
डिजिटल मीडिया के पत्रकारों के लिए सरकार बनाए कानून
सदन में पत्रकारों की असुरक्षा पर बात करते हुए अशोक कुमार कोठारी ने कहा कि उन्होंने डिजिटल पत्रकारों के लिए भी सरकार से नियम-कानून बनाने की मांग रखी। उन्होंने कहा कि जिस तरह प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों के लिए नियम-कायदे-कानून हैं। अब उसी तरह डिजिटल मीडिया के पत्रकारों के लिए भी नियम-कानून बनाए जाएं। उन्होंने कहा कि पत्रकार के बच्चों को स्कॉलरशिप तो मिलती है लेकिन उसकी प्रक्रिया काफी जटिल है, इसे भी सरल किया जाए।
जो पत्रकार जिला स्तरीय अधिस्वीकृत समाचार पत्र हैं साथ में लघु समाचार पत्र हैं, उनकी विज्ञापन दर को बढ़ाया जाए। क्योंकि 2013 के बाद उनकी दरों को नहीं बढ़ाया गया है। पत्रकारों के पास भूखंड नहीं है, उनके लिए पत्रकार कॉलोनी बनाई जाए और जिनके पास भूखंड नहीं है, उन्हें आवंटित की जाए। इसके अलावा पत्रकारों को RGHS स्कीम के तहत लाया जाए।
विधायक गोपाल शर्मा ने दिया समर्थन
अशोक कोठारी की इस मांग का बीजेपी विधायक गोपाल शर्मा ने अपना समर्थन दिया। उन्होंने सदन के बाहर मीडिया से बातचीत में कहा कि सरकार को एक कमेटी बनानी चाहिए। जो पत्रकारों की समस्याओं को सुने और इनके समाधान किए जाए। राजस्थान में ये व्यवस्था रही है कि प्रांतों के हिसाब से केंद्र के हिसाब से ये परंपरा रही है कि उनके लिए आवास की व्यवस्था हो। आने वाले समय में और कौन पत्रकार हो सकते हैं, इसे ध्यान में रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई कार्यक्रमों के अंदर अधिस्वीकृत और गैर अधिस्वीकृत के बीच में खाई बनी हुई है, उसका फायदा वो लोग उठाते हैं जिन्होंने कभी पत्रकारिता की ही नहीं। पत्रकारिता के अंदर दो तरह के पत्रकार होते हैं, जिनका चेहरा कैमरे के सामने होता है लेकिन दूसरे जिनका चेहरा पर्दे के पीछे है। कोरोना में ये घोषणा हुई कि पत्रकारों के निधन पर 50 लाख का मुआवज मिलेगा। पत्रकार मजबूत होंगे तो मीडिया संस्थान मजबूत होंगे।
लंबे समय से चल रहा पत्रकारों के आवास का मुद्दा
दरअसल राजस्थान में पत्रकारों के लिए आवास और भूखंड का मामला सालों से लटका हुआ है। नायला की योजना हो या सन् 2002 की नीति। कानूनी पेंच, जमीन की कमी और 10 साल तक बिक्री पर रोक, हर बार मुद्दा आधा-अधूरा रह गया। अब जब विधानसभा में आवाज़ फिर गूंजी है तो पत्रकारों में उम्मीद जग गई है कि शायद इस बार समाधान निकले। अब देखना ये है कि जो पत्रकार पूरे प्रदेश की समस्याएं सरकार तक पहुंचाते हैं, क्या उनकी अपनी समस्या सत्ता तक पहुंच पाएगी?
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