लोकसभा में राजकुमार रोत करवाया चुप तो सोशल मीडिया पर सांसद का फूट पड़ा गुस्सा!

Rajkumar Roat: क्या देश की सबसे बड़ी पंचायत में आदिवासियों की आवाज़ को दबाया जा रहा है? ये सवाल हम नहीं, बल्कि डूंगरपुर-बांसवाड़ा के सांसद राजकुमार रोत उठा रहे हैं। लोकसभा में नक्सलवाद उन्मूलन पर हुई 6 घंटे की लंबी चर्चा अब एक बड़े विवाद में तब्दील हो गई है। राजकुमार रोत का आरोप है कि जिस मुद्दे से सबसे ज्यादा आदिवासी समाज प्रभावित हैं, उसी मुद्दे पर आदिवासी सांसदों को बोलने का मौका नहीं दिया गया।
6 घंटे की चर्चा चली लेकिन एक भी आदिवासी को बोलने का मौका नहीं- रोत
राजकुमार रोत (Rajkumar Roat) ने सोशल मीडिया पर लाइव आकर अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा कि चर्चा 6 घंटे 7 मिनट तक चली, 35 सांसदों ने अपनी बात रखी, लेकिन हैरानी की बात ये है कि बीजेपी की तरफ से एक भी आदिवासी सांसद को इस गंभीर विषय पर बोलने का अवसर नहीं मिला। रोत ने सवाल उठाया कि बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित इलाके से आने वाले सांसदों को चुप क्यों रखा गया? जबकि कंगना रनौत जैसे सदस्यों को 9-10 मिनट का समय दिया गया।
महज 3 मिनट का समय मिला- रोत
ये विवाद तब और बढ़ गया जब राजकुमार रोत को चर्चा के आखिर में महज 3 मिनट का समय मिला। जब उन्होंने पेसा (PESA) कानून, पांचवीं अनुसूची और जल-जंगल-जमीन के पट्टों पर सवाल किया, तो गृह मंत्री भड़क गए। गृह मंत्री ने यहां तक कह दिया कि— "अगर आप भी हथियार उठाते तो सरेंडर होते, चुनाव जीतकर नहीं आते।"
बंदूक से नहीं बल्कि कलम और कागज़ से करनी है लड़ाई
इस पर रोत ने पलटवार करते हुए कहा कि आदिवासी समाज को अपनी लड़ाई बंदूक से नहीं, बल्कि कलम और कागज से लड़नी है। उन्होंने गृह मंत्री के डेढ़ घंटे के जवाब पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार ने नक्सलवाद पर तो बात की, लेकिन आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों पर चुप्पी साध ली।
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