बांसवाड़ा: मौत पर जश्न और जन्म पर मातम! इस गांव में ये क्या हो रहा है

Banswara: कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था। जिसमें एक तरफ एक शख्स की चिता चल रही थी। लेकिन दूसरी तरफ बैंड-बाजे, नाच-गाना हो रहा था। लोग मंगलगान कर रहे थे। ये वीडियो जिसने भी देखा उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। आम तौर पर कुछ लोग अपने किसी खास संबंधी की मौत पर बैंड तो बजवाते दिखते हैं। लेकिन इस कदर का जश्न, ये तो कहीं नहीं देखा। लेकिन ये सच था। अब आपको बताते हैं मजे की बात, दरअसल य़े जश्न ऐसे ही नहीं मनाया जा रहा था बल्कि इसके पीछे है एक परंपरा जो राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के एक गांव में मनाई जाती है।
सातिया समुदाय की है ये अनोखी परंपरा
ये परंपरा सातिया समुदाय निभाता है। सिर्फ इंसान के मरने पर ये खुशी ही नहीं मनाता बल्कि बच्चे के जन्म पर मातम मनाता है। दुनिया भर मे जहां बच्चे के जन्म पर घरों में नई खुशियां आती हैं। लोग बड़े-बड़े जलसे के तौर पर इसे मनाते हैं। लेकिन सातिया समुदाय की कहानी कुछ अलग है। एक औऱ खास बात कि सातिया समुदाय के सिर्फ दो दर्जन परिवार ही इस गांव में हैं लेकिन सदियों पुरानी एक ऐसी सोचजो आम दुनिया से बिल्कुल अलग चलती है।
क्यों निभाई जाती है ये परंपरा?
सातिया समुदाय मानता है कि आत्मा का असली लक्ष्य है—मोक्ष और जन्म लेना मतलब आत्मा का एक बार फिर दुखों की दुनिया में लौट आना। उनके शब्दों में अगर आत्मा फिर कैद हो गई फिर एक नया संघर्ष, नया कष्ट शुरू…इसलिए जन्म उनके लिए खुशी नहीं, दुख की शुरुआत है। वहीं किसी की मौत पर यहां जश्न शरू हो जाता है। नाच-गाना शुरू हो जाता है। क्योंकि सातिया समुदाय मानता है कि उनके लिए मौत का मतलब है इस संसार से मुक्ति। आत्मा अब दुख और दर्द के इस चक्र से हमेशा के लिए आजाद हो गई। यानी ‘भौतिक कैद’ खत्म हो गई।
यहां किसी की जब मौत हो जाती है। तब उसकी शव यात्रा बड़े धूमधाम से निकाली जाती है। लोग नए कपड़े पहनते हैं और आखिरी आग ठंडी होने के बाद बड़ा भंडारा करते हैं। उनके लिए मौत, दुख का नहीं बल्कि खुशी का दिन है।
समाज के मानकों को चुनौती देती है परंपरा
सातिया समुदाय की ये सोच लोगों के तय किए हुए मानकों को चुनौती देती है कि क्या सच में जन्म हमेशा खुशी है। क्या मौत हमेशा दुख? राजस्थान की धरती पर ऐसी अनोखी परंपराएं सिर्फ कहानी नहीं ये इस बात की गवाही हैं कि दुनिया को समझने के नजरिए सिर्फ एक नहीं, कई हो सकते हैं। सातिया समुदाय की ये परंपरा हमेशा याद दिलाती है कि जिस चीज़ को हम अंत मानते हैं कहीं वो किसी के लिए मुक्ति की शुरुआत भी हो सकती है।
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