दहेज में दी जाती कुंवारी लड़कियां...अंदर तक झकझोर देगी इस प्रथा की ये दर्दनाक सच्चाई

Dabariya Pratha: सोचिए, एक ऐसी परंपरा, जहां शादी में दुल्हन तो जाती ही है, पर उसके साथ दहेज में भेजी जाती हैं कुंवारी लड़कियां। जी हां, राजस्थान के इतिहास में एक रिवाज़ दर्ज है। इसका नाम डावरिया है। इसके बारे में कहा जाता है कि जिसने समाज की बुनियाद को हिला दिया था। आज हम उसी सच्चाई के दरवाज़े खोलने वाले हैं। वो इतिहास, जिसे अक्सर किताबों में दबाकर रखा गया। लेकिन समाज पर इसका असर गहरा पड़ा और बाद में वो दहेज बना।
लेकिन क्या आप जानते हैं? शुरुआत में इस शब्द का मतलब था शादी करने वाले लड़की की नई जिंदगी के लिए मदद लेकिन वक्त ने इसे तोहफे से सौदे में बदल दिया। कई घरों में ये प्रथा दर्द, ज़ुल्म और मौत का कारण बन गई। लेकिन इसी दहेज प्रथा से जुड़ी राजस्थान की एक परंपरा है। जिसके बारे में कम लोग जानते हैं।
क्या है डावरिया प्रथा की पूरी कहानी?
अब इस डावरिया प्रथा (Dabariya Pratha in Rajasthan) की कहानी सुनिए, पहले राजस्थान के राजपूत घरानों में जब किसी राजकुमारी का विवाह होता था। तो उसके साथ दहेज में कुंवारी लड़कियां भेजी जाती थीं। इन लड़कियों को जिंदगी भर दुल्हन के साथ ही रहना होता था। उसकी सेवा ही करनी होती थी। दुल्हन के साथ भेजे जाने के बाद ना तो इनके परिवार से कोई इनका संपर्क होता था। ना इनका कोई अपना भविष्य होता था, ना खुद की इच्छाएं होती थीं। इनके हिस्से सिर्फ और सिर्फ राजकुमारियों की आजीवन सेवा आती थी। ये लड़कियां राजकुमारी के साथ उसके नए महल जाती थीं और वहीं उनकी सेविका के तौर पर अपनी बाकी जिंदगी गुजारती थीं।
लेकिन इससे भी बड़ी दर्दनाक कहानी तो तब शुरू होती है। जब वही लड़कियां बड़े होते-होते राजमहल के जीवन का हिस्सा बन जातीं। तो कई बार उन पर राजा या राजपरिवार की नज़र पड़ जाती थी। सोचिए वो वक्त कितना दर्दनाक और कितना असहनीय हो सकता था। जब वो लड़की इसके लिए मना भी नहीं कर सकती। क्योंकि वो एक दासी होती थी और तब दासियों पर पूरा अधिकार राजा और राजमहल का ही होता था। अक्सर तो ऐसा होता था कि कई लड़कियों को बच्चे भी हो जाते थे। लेकिन इन बच्चों को कभी उनकी पहचान तक नहीं मिलती थी। वो गुमनामी के साए में जीते थे। ये उसी महल की चारदीवारी में बड़े-बड़े होते-होते सेवक बन जाते थे।
इस तरह खत्म हुई ये प्रथा?
अब जैसे-जैसे वक्त बदला समाज आगे बढ़ा, लोगों की सोच बदली तो उन्होंने इस प्रथा का विरोध करना शुरू किया। इसका दबाव राजघरानों पर पड़ा। उनका ढांचा बदला और डावरिया प्रथा धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बनकर खत्म हो गई। लेकिन इसके निशान आज भी राजस्थान की लोककथाओं और परिवारों के इतिहास में दर्ज हैं।
ये कहानी सिर्फ इतिहास नहीं है बल्कि ये सवाल है उन परंपराओं का, जो समाज की जड़ों में अन्याय भर देती थीं। राजस्थान वीरों की भूमि है ये हम मानते हैं और पूरा देश और दुनिया भी इसे जानती और मानती है। लेकिन यहां की हर परंपरा वीरता और शौर्य की कहानी नहीं बल्कि कुछ दर्द और गुमनामी के किस्से बयां करती हैं।
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