CM छोड़िए राजस्थान को आज तक नहीं मिला जाट गृह मंत्री, क्या है ये 74 साल का खेल?

Rajasthan Politics: राजस्थान की सियासत में एक कड़वी सच्चाई हमेशा चुपचाप दबाई जाती रही है। वो ये कि इस राज्य में आज तक एक भी जाट ना मुख्यमंत्री बना और ना ही गृह मंत्री और ये तब है। जब जाट समुदाय राजस्थान की राजनीति का सबसे बड़ा सामाजिक जनसमूह माना जाता है। ऐसे में सवाल सीधा है कि ये सिर्फ संयोग है या राजनीतिक दलों की सोची-समझी रणनीति।
बीजेपी-कांग्रेस दोनों ने एक ही पैटर्न पर किया काम
ये बात सिर्फ जातिगत लहजे से नहीं बल्कि सामाजिक नजरिए से भी अहम है। दरअसल राजस्थान का आकार बड़ा है। यहां का भूगोल बड़ा जटिल है और कानून-व्यवस्था का बोझ भी भारी है। यानी एक स्वतंत्र गृह मंत्री की जरूरत हमेशा से थी। लेकिन सूबे में दशकों से एक ही खेल चल रहा है कि CM ही खुद गृह विभाग संभालता रहा है। गृह राज्य के नाम पर वो सिर्फ एक मंत्री देकर इतिश्री कर लेते हैं। कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ने इस पद को हमेशा एक शक्ति-केंद्र की तरह ट्रीट किया और यहीं पर राजनीति का असली गणित छिपा है।
गृह मंत्री ना होने से कानून-व्यवस्था पटरी से उतरती
कांग्रेस ने 2018–2023 में गृह मंत्री नहीं दिया। इस दौरान प्रदेश में कानून-व्यवस्था का जो हाल रहा वो सिर्फ सूबे में ही नहीं बल्कि पूरे देश ने देखा। NCRB की रिपोर्ट ने जयपुर और राजस्थान का नाम सबसे ज्यादा क्राइम वाले शहर और प्रदेश की सूची में रखा। 2022 में एक सर्वे हुआ था जिसमें 3.8% कोर वोटर कानून-व्यवस्था से नाखुश थे और चुनाव में जीत-हार का अंतर सिर्फ 2.14%. इसका सीधा मतलब था कि अगर कांग्रेस लॉ-एंड-ऑर्डर का सिग्नल ठीक दे देती तो सरकार रिपीट हो सकती थी। लेकिन गृह विभाग मुख्यमंत्री के पास रह और जनता का भरोसा पस्त हो गया।
गृह मंत्री रखा भी तो अधिकार सीमित रखे
दूसरी बात बीजेपी ने हमेशा गृह मंत्री तो रखा लेकिन अधिकारों पर लिमिट रखी। चाहे वो भैरो सिंह शेखावत हों या फिर वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje)। इनकी सरकार के दौरान गृह मंत्री का पद मौजूद था लेकिन अधिकार लिमिटेड ही थे। यानी कागज़ पर गृह मंत्री पर फैसला फिर भी CM के हाथों में।
तीसरी बात 1949 के बाद राजस्थान की पूरी लिस्ट देखें तो इसका खेल साफ नजर आता है कि आजादी के बाद लगातार एक पैटर्न चलता रहा। जय नारायण व्यास से लेकर हरिदेव जोशी, भैरो सिंह शेखावत, अशोक गहलोत (Ashok Gehlot),वसुंधरा राजे सभी ने गृह विभाग खुद अपने पास रखा। कैबिनेट स्तर पर जो नेता गृह मंत्री बने भी, उनकी लिस्ट तो लंबी है। लेकिन उसमें जाट समाज का नाम नहीं मिलता, यानी सत्ता की दूसरी सबसे ताकतवर कुर्सी, गृह मंत्रालय से कुछ खास समुदायों को लगातार दूर रखा गया।
कानून व्यवस्था बिगड़ती तो जनता नाराज
चौथी बात 1993 के बाद कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं बचा पाया। इसका सबसे कारण सामने आता है मजबूत गृह मंत्री की गैरमौजूदगी का। क्योंकि सूबे में कानून-व्यवस्था बिगड़ती है। जनता नाराज़ होती है और सरकारें गिरती हैं और जवाबदेही किसी की नहीं। क्योंकि दंगे कितने दिनों में काबू आते हैं? कौन कमान संभालता है? राज्य कितनी जल्दी प्रतिक्रिया देता है? इंवेस्टर्स सबसे पहले यही देखते हैं और राजस्थान में ये जिम्मेदारी अक्सर एक ही कुर्सी पर ओवरलोड कर दी जाती है और वो मुख्यमंत्री पर।
अब सबसे बड़ा सवाल कि जाट समाज को सालों से इस पद से आखिर क्यों दूर रखा जा रहा है। 12% आबादी, सियासी वजन और ऐतिहासिक प्रभाव होने के बावजूद राजस्थान की सत्ता का सबसे ताकतवर मंत्रालय आज तक जाट समाज को क्यों नहीं मिला? मुख्यमंत्री तो दूर इस पद पर भी उनकी पहुंच नहीं हो पा रही है। क्योंकि राज्य तब तक स्थिर नहीं हो सकता जब तक सत्ता ये मानने को तैयार न हो कि गृह विभाग शक्ति का केंद्र नहीं बल्कि उसकी रीढ़ है।
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