Hanuman Jayanti 2026: तो ऐसे हुआ था हनुमान जी का जन्म? आज तक नहीं सुनी होगी ये कहानी

Hanuman Born Story: "नासै रोग हरे सब पीड़ा जबत निरंतर हनुमत बीरा'' इसका अर्थ है जब भी आप हनुमान जी का नाम जपते हैं तो कोई रोग, दुःख आपको छू भी नहीं सकता। यही नहीं हनुमान जी की कहानी हमें यह सिखाती है कि हमारे अंदर असीम शक्ति (inborn power) और क्षमताएं छिपी हुई हैं, जिन्हें अक्सर हम भूल जाते हैं। जिस तरह से उन्होंने अपनी शक्ति को पहचाना, वैसे ही हम भी अपनी योग्यता को पहचानें और खुद पर भरोसा रखें।
शिवजी के अवतार हैं हनुमान जी
कहते है की हनुमान जी (Lord Hanuman Ji) भगवान शिव के अवतार हैं। लेकिन कई लोगों को ये नहीं पता कि हनुमान जी का जन्म कैसे हुआ था? और कैसे भगवान शिव (Lord Shiva) ने माता अंजनि की भक्ति और प्रार्थना से खुश होकर उन्हें अपनी माता के रूप में माना। लेकिन ये सब जानने के लिए आपको हम हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) की इस पावन दिन पर पुराणों के उन पन्नों में लेकर जा रहे हैं, जब अंजनि माता की एक भूल ने उन्हें हनुमान जी की माता बनाने का सौभाग्य दे दिया।
कैसे हुई था हनुमान जी का जन्म?
अंजनि माता (Maa Anjani) असल में ब्रह्म देव के दरबार में एक अप्सरा थीं। वे बहुत ही सुंदर और चंचल थीं, लेकिन उनसे एक भूल हो गई कि उन्होंने एक ऋषि को वानर समझकर उन पर पत्थर फेंक दिया। जिससे वे क्रोधित हो गए और उन्हें श्राप दे दिया कि जब भी उन्हें किसी से प्रेम होगा, तो वो वानर के रूप में बदल जाएगी। माता अंजनि ने ऋषि से माफी मांगी वे बहुत व्याकुल हो गई थीं। जिसे देख कर ऋषि ने उनकी प्रार्थना सुनी। उन्होंने कहा कि वे अपना श्राप वापस नहीं ले सकते। लेकिन इतना वरदान दे सकते हैं कि जिससे भी उन्हें प्यार होगा वह अंजनि को वानर रूप में भी पसंद करेंगे। साथ ही उसे इस श्राप से मुक्ति तब मिलेगी। जब वे महादेव के अवतार को जन्म देगी।
सालों बाद, जब अंजनि माता ने धरती पर इंसान रूप में जन्म लिया, तो वे एक सुंदर और लंबे कद वाले इंसान से प्यार करने लगीं। वे कोई और नहीं बल्कि हनुमान जी के पिता और वानर कुल के राजा केसरी थे जिनमें इंसान और वानर बनने की शक्तियां थी। उसे देखते ही ऋषि का श्राप सच हो गया और अंजना माता वानर में बदल गई।
पौराणिक कथाएं ये बताती हैं कि अंजनि माता महादेव की बहुत बड़ी भक्त थीं। उन्होंने दिन-रात भगवान शिव की घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर उसे वरदान मांगने को कहा। महादेव की ये बात सुनकर उनकी आंखे भर आईं और वे उनसे बोलीं कि प्रभु मैं आपको अपने बेटे के रूप में चाहती हूं। भगवान शिव ने उसकी प्रार्थना सुनी और उसे वरदान दिया कि वे उनके बेटे के रूप में जन्म लेंगे।
अयोध्या के राजा दशरथ पुत्र पाने के लिए हवन कर रहे थे, ताकि उन्हें बच्चे हो सकें। जिससे अग्नि देवता ने उन्हें प्रसाद में खीर दी कहा कि इसे अपनी पत्नियों में बांट दें, ताकि उन्हें दिव्य बच्चे हो सकें। राजा दशरथ ने जब कौशल्या को खीर देने लगे तभी एक चील ने उसे छीन लिया और वहां ले गया जहां अंजनि तपस्या कर रही थी। महादेव ने वायुदेव को आदेश दिया कि खीर की प्रसाद को अंजनि को दे दें। शिव का प्रसाद समझकर जब अंजनि ने उससे खाया तो कुछ दिनों में उनका एक बेटा पैदा हुआ। जिसमें भगवान शिव जैसा ही तेज, साहस और शक्तियां थीं। इनका नाम उन्होंने मारुति रखा।
ऐसा कहा जाता है कि हनुमान जी खीर से ही पैदा हुए थे, इसलिए वे अमर हैं। अमर रहने का आशीर्वाद सीताजी ने भी उन्हें दिया था। इसलिए आज भी वे इसी धरती पर हैं। अपने भक्तों को सदा देखते रहते हैं उनसे प्यार करते हैं और हर मुश्किल से उनकी रक्षा करते हैं।
कंटेंट- एकता शर्मा
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