लेफ्ट का सूपड़ा साफ़! अब भारत में किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बची! आखिरी गढ़ केरल भी गिरा

लेफ्ट का सूपड़ा साफ़! अब भारत में किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बची! आखिरी गढ़ केरल भी गिरा
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05 May 2026, 01:55 pm
रिपोर्टर : Dushyant

No Left Government India: केरल विधानसभा चुनाव का जो रिजल्ट सामने आया है उससे एक चीज़ साफ़ है कि अब भारत के किसी भी राज्य में लेफ्ट कि सरकार नहीं बची है। केरल में कांग्रेस के बहुमत से जीत दर्ज करने के बाद भारत में लेफ्ट सरकार का आखिरी किला भी ढह गया है और पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली आखिरी वामपंथी सरकार अलविदा कह चुकी है।

आज़ादी के बाद भारत में पहली बार ऐसा हो रहा है जब देश के किसी भी राज्य में वामपंथी दल सत्ता में काबिज़ नहीं रहेंगे। इससे पहले पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भी वामपंथ कि सरकारें बनीं हुई थीं, लेकिन उनको भी TMC और BJP ने उखाड़ फेंका था। केरल वामपंथ की आखिरी उम्मीद बचा था, लेकिन अब लेफ्ट का पूरी तरह से सूपड़ा साफ हो चुका है।

इतिहास में पहली बार 'नो लेफ्ट' दौर

आज़ादी के बाद 1957 में केरल में पहली बार वामपंथी सरकार बनी थी। ये सरकार EMS नंबूदरीपाद के नेतृत्व में बनी थी, जिसके बाद वामपंथ कई राज्यों में फ़ैल गया और लंबे समय तक सत्ता में रहा। लेकिन धीरे-धीरे लेफ्ट विंग से लोगों का भरोसा उठने लगा और वामपंथ गिरने लगा।

देश में वामपंथ की आखिरी तीन सरकारें पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल में बची थी। पश्चिम बंगाल में वामपंथ सरकार को ज्योति बसु ने 34 साल चलाया, लेकिन 2011 में ममता बनर्जी ने उसे समाप्त कर दिया। त्रिपुरा में भी 25 साल तक लेफ्ट के शासन का दौर रहा, लेकिन उसे भी 2018 में भाजपा ने खत्म कर दिया और अपना झंडा गाड़ दिया। आखिरी सरकार केरल में बची थी, लेकिन अब वो भी सत्ता से उतारकर विपक्ष में बैठ चुकी है।

क्यों ख़त्म हुई केरल में लेफ्ट सरकार

केरलम में 2016 में पिनाराई विजयन सत्ता में आए थे, जो वामपंथी दल से थे। उन्होंने 2021 में फिर से चुनाव जीता और अपनी सत्ता बरक़रार रखी। लेकिन, केरलम कि जनता 10 साल से एक ही राजनेता को देखती आ रही थी और बदलाव चाहती थी। इसलिए इस बार जनता ने बदलाव के मौके को नजरअंदाज नहीं किया और नयी सत्ता चुनी।

वैसे आपको बता दें कि केरलम में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग और दूसरी छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन कर जीत हासिल की है। हालाँकि इस UDF गठबंधन में कुछ छोटी वामपंथी पार्टियां भी शामिल हैं, लेकिन उनका प्रभाव सीमित माना जा रहा है।

यह नतीजा न सिर्फ केरल बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए बहुत ख़ास माना जा रहा है, क्योंकि अब राज्य स्तर पर वामपंथी या लेफ्टिस्ट विचारधारा पूरी तरह से सत्ता से दूर हो गई है।


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