क्या होती है तानाशाही? युगांडा के इस क्रूर नेता ने दिखाया, खौफ ऐसा कि आज भी नाम लेते ही थरथराने लगती है देश की जनता

जो लोग आज भारत की मोदी सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाते नहीं थकते, उन्हें शायद तानाशाही का मतलब नहीं पता है और ना ही उन्होंने तानाशाही का दौर देखा है। क्योंकि आज हम आपको आधिकारिक तौर पर घोषित एक ऐसे तानाशाह के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपके रोंगटे खड़े कर देंगी। ये तानाशाह युगांडा का पूर्व राष्ट्रपति ईदी अमीन था।
ईदी अमीन दुनिया का सबसे क्रूर तानाशाह कहा जाता है। वो 1971 से 1979 तक युगांडा की सत्ता में रहा था अपने इस दौर में वो युगांडा में शासन हत्या, यातना, डर और सनक का दूसरा नाम बन गया था। इतिहासकारों के मुताबिक उसके शासनकाल में लगभग 3 लाख लोगों की हत्या हुई। हालांकि अलग-अलग रिपोर्ट्स में ये आंकड़ा भी अलग-अलग है। ईदी अमीन का शासन बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघनों से भरा पड़ा था।
इतना निर्दयी शख्स फिर कैसे बना राष्ट्रपति
ईदी अमीन की जन्मतिथि की आधिकारिक पुष्टि नहीं है। इसका जन्म 1925 के आसपास का माना जाता है। वहीं कुछ इतिहासकार उसका जन्म के 1923-1928 के बीच मानते हैं। ऐसा इसलिए था क्योंकि उसने ना तो कभी अपनी आत्मकथा लिखी और ना ही किसी और को ऐसा करने दिया। इसका जन्मस्थान उत्तर-पश्चिमी युगांडा का कोबोको या कंपाला था। पिता का नाम आंद्रेया न्याबिरे था और मां अस्सा आट्टे थीं।
कई इनसाइक्लोपीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक ईदी अमीन के पिता न्याबिरे काकवा जातीय समूह के सदस्य थे। उसने 1910 में रोमन कैथोलिक ईसाई से इस्लाम ग्रहण कर लिया था फिर अपना नाम अमीन दादा रख लिया था। इसलिए उसने अपने पहले बच्चे के नाम अपने नाम के आधार पर ही रख दिया। लेकिन बेहद कम उम्र में न्याबिरे ने अपने परिवार को छोड़ दिया था। जिसके बाद ईदी अमीन को उनकी मां ने अकेले ही पाला था। वो लुग्बारा जाति की थीं और हकीम थीं।
अपने जन्म के 16 साल बाद स्कूल में एडमिशन लिया लेकिन चौथी क्लास तक ही की पढ़ाई
अमीन को औपचारिक शिक्षा बेहद कम मिली थी। उन्होंने 1941 में बोम्बो के एक इस्लामी स्कूल में एडमिशन लिया। लेकिन चौथी क्लास की अंग्रेजी भाषा तक पढ़ने के बाद स्कूल छोड़ दिया। फिर जीवन चलाने के लिए कई छोटे-मोटे काम किए। 1946 में वो एक सहायक रसोईये के रूप में ब्रिटिश औपनिवेशिक सेना किंग्स अफ्रीकन राइफल्स में भर्ती हो गया था। लेकिन ऐसा कहा जाता कि ईदी को मजबूरन सेना में भर्ती होना पड़ा था। क्योंकि वो वक्त दूसरे विश्व युद्ध का था और ब्रिटिश साम्राज्य जबरन नागरिकों को सेना में डालती थी।
लेकिन ईदी अमीन अपनी शारीरिक ताकत और सैन्य क्षमता के दम पर तेजी से ऊपर बढ़ा। इसकी लंबाई 6 फुट 4 इंच की थी। वो अच्छा एथलीट भी बन गया था। वो 1951 से 1960 तक युगांडा का बॉक्सिंग चैंपियन भी था। साथ ही पेशेवर स्विमर भी था। इसी के दम पर वो रसोईये से धीरे-धीरे सेना की मुख्यधारा में आता गया और 1963 तक वो युगांडा की सेना में मेजर बन गया था।
साल 1971 में उसने तत्कालीन राष्ट्रपति मिल्टन ओबोटे का तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया। ईदी अमीन के सबसे डरावने और अनसुने किस्से आज भी लोगों को डरा देते हैं।
1. विरोधियों को गायब कर दिया जाता था
अमीन के शासन में सरकार के विरोधी, पत्रकार, न्यायाधीश, सैन्य अधिकारी और आम नागरिक अचानक लापता हो जाते थे। हजारों लोगों के शव कभी मिले ही नहीं। इतना ही नहीं उसने युगांडा की सुरक्षा एजेंसियों को बिना मुकदमे लोगों को उठाने और मारने की खुली छूट दी हुई थी। कहा जाता है कि उसके 8 साल के शासन में 3 लाख लोगों की हत्याएं हुईं। अंतर्राष्ट्रीय न्यायविद आयोग के मुताबिक युगांडा में कम से कम 80,000 और ज्यादा से ज्यादा लगभग 3,00,000 लोग मारे गए थे। वहीं एमनेस्टी इंटरनेशनल की मदद से निर्वासित संगठनों के मुताबिक लगभग युगांडा में 5,00,000 लोग मारे गए। आप ये जानकार हैरान रह जाएंगे कि मारे गए सबसे प्रमुख लोगों में पूर्व प्रधानमंत्री, और देश के मुख्य न्यायाधीश तक शामिल थे।
2. भारतीयों और एशियाई समुदाय को 90 दिन में देश छोड़ने का दिया आदेश
1972 में अमीन ने करीब 60,000 एशियाई मूल के लोगों, जिनमें बड़ी संख्या भारतीयों की थी, उन्हें 90 दिनों के भीतर युगांडा छोड़ने का आदेश दे दिया। उनकी संपत्तियां जब्त कर ली गईं। हालांकि इस फैसले से युगांडा की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ, क्योंकि व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुदाय के हाथ में था।
3. खुद को दुनिया का सबसे बड़ा नेता घोषित करता था
ईदी अमीन अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा नेता मानता था। वो खुद को "ब्रिटिश साम्राज्य का विजेता" और "सभी जानवरों-समुद्री जीवों का स्वामी" जैसे खिताब देता था। उसकी सनक दुनिया भर में चर्चा का विषय बनती थी।
4. इंसानी सिर फ्रीजर में रखने का दावा
दशकों से ये दावा किया जाता रहा कि अमीन अपने विरोधियों के कटे हुए सिर फ्रीजर में रखता था और उनके शरीर को खाता था। इनमें से एक ये भी दावा है कि वो अपनी पत्नियों में से एक के शव की विकृति तक की थी। हालांकि कई आधुनिक इतिहासकारों का कहना है कि इन आरोपों के ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं और इन्हें प्रमाणित नहीं माना जा सकता। उसके शासन की क्रूरता तो तथ्यात्मक है लेकिन इस तरह के दावों पर अभी तक इतिहासकारों में मतभेद हैं।
5. दुश्मनों को सरेआम अपमानित करता
अमीन अक्सर विदेशी नेताओं और ब्रिटेन के खिलाफ भड़काऊ बयान देता था। कई बार वो अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचने के लिए अजीबोगरीब घोषणाएं करता था, जिससे उसकी सनकी छवि और मजबूत हुई। विदेशी मीडिया भी उसे इसी तरह की कवरेज देता था बिल्कुल वैसे जैसे आज उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की, की जाती है। इतिहासकार बताते हैं ऐसा ईदी जानबूझकर करता था ताकि उसके देश के मुद्दे अंतर्राष्ट्रीय ना बन सके और कोई इसमें दखल ना दे सके।
6. सत्ता बचाने के लिए बेरहम दमन
उसके शासनकाल में सेना और खुफिया एजेंसियां डर का सबसे बड़ा हथियार थीं। संदिग्ध लोगों को यातनाएं देना, बिना मुकदमे हत्या करना और पूरे समुदायों को निशाना बनाना आम बात बन गई थी।
दिलचस्प बात ये है कि 4 जुलाई 1976 को युगांडा में हुआ इजरायल का ऑपरेशन थंडरबोल्ट ईदी के ही शासन काल में चलाया गया था। इस तानाशाह के देश से इजरायली सेना, फिलिस्तीनी आतंकियों के हाईजैक किए फ्रांस के विमान में सवार लोगों को सुरक्षित लेकर आई थी। इस विमान में कुल 268 यात्रियों में इजरायल के 77 यात्री थे। ये प्लेन फिलिस्तीनी आतंकियों ने युगांडा के एंटेबे में लाकर खड़ा किया था।
इस ऑपरेशन में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद से मिलकर सेना ने युगांडा में इन फिलिस्तीनी आतंकियों और युगांडा की सेना को मार गिराया था। इसमें इजरायल के वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के भाई योनी नेतन्याहू की मौत हो गई थी। वे उस वक्त वे इजरायली सेना के कमांडर थे और खुद इस ऑपरेशन को ऑपरेट करने गए थे। इसी के बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने इजरायल का चुनाव जीता था।
कैसे हुआ ईदी अमीन का अंत?
1978 में ईदी अमीन ने पड़ोसी देश तंजानिया पर हमला कर दिया। इसके जवाब में तंजानिया की सेना और युगांडा के निर्वासित विद्रोहियों ने संयुक्त अभियान चलाया। अप्रैल 1979 में युगांडा की राजधानी कंपाला पर कब्जा होने के बाद अमीन देश छोड़कर भाग गया। पहले वो लीबिया पहुंचा और बाद में सऊदी अरब में शरण ली, जहां 2003 में उसकी मौत हो गई। उस पर कभी अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुकदमा नहीं चल सका।
ईदी अमीन का शासन आज भी अफ्रीका के सबसे हिंसक और भयावह दौरों में गिना जाता है। उसकी तानाशाही ने न केवल हजारों परिवारों को उजाड़ा, बल्कि युगांडा की अर्थव्यवस्था और संस्थाओं को भी गहरी चोट पहुंचाई।
ये भी पढ़ें- मारवाड़ के ऐसे राजा जिनसे खौफ खाता था औरंगजेब, निधन पर रोए थे बंदर, पढ़ें पूरी कहानी
इस लिंक को शेयर करें

