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Gen Z में Telephobia: फोन पर बात करने में घबराहट, मैसेजिंग में क्यों महसूस होता है कंफर्ट?

Gen Z में Telephobia: फोन पर बात करने में घबराहट, मैसेजिंग में क्यों महसूस होता है कंफर्ट?
लाइफ स्टाइल
25 Jun 2026, 05:39 pm
रिपोर्टर : ज्योति शर्मा

Telephobia in Gen Z: आज के डिजिटल दौर में लगभग हर किसी के हाथ में मोबाइल है। इसी बीच एक ट्रेंड तेजी से चर्चा में है, जिसमें जेन-जी यानी नई पीढ़ी के युवाओं को फोन कॉल से घबराहट होने लगी है। उन्हें कॉल करने या रिसीव करने के बजाय टेक्स्ट करना ज्यादा पसंद आता है। अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर वे बातचीत के लिए मैसेजिंग को प्राथमिकता देते हैं। इसी बर्ताव को देखते हुए जानकारों ने इसे ‘टेलीफोबिया’ नाम दिया है।

टेलीफोबिया क्या है?

टेलीफोबिया का मतलब है फोन कॉल आने या किसी से फोन पर बात करने में डर, घबराहट या असहजता महसूस होना। ये कोई बीमारी नहीं है, लेकिन इससे प्रभावित लोग फोन की घंटी बजते ही तनाव, बेचैनी और घबराहट महसूस करने लगते हैं। कई मामलों में देखा गया है कि कॉल आते ही उनकी हार्टबीट तेज हो जाती है। यही वजह है कि ऐसे लोग अक्सर कॉल रिसीव करने से बचते हैं और उसे टाल देते हैं।

जेन-जी को क्यों पसंद आती है टेक्स्टिंग?

जानकारों का कहना है कि टेक्स्टिंग जेन-जी को ज्यादा सहज लगती है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि इसमें ना तो कोई उन्हें देख रहा होता है और ना ही तुरंत जवाब देने का दबाव होता है। वे सोच-समझकर जवाब लिख सकते हैं और भेजने से पहले अपने मैसेज को एडिट भी कर सकते हैं।

वहीं, फोन कॉल पर उन्हें तुरंत जवाब देना पड़ता है, जिससे उन पर दबाव महसूस होता है। इसके अलावा फोन कॉल में सामने वाले के हाव-भाव नहीं दिखते, जिससे बातचीत को समझना कई बार मुश्किल हो जाता है। कई युवाओं का मानना है कि कॉल अचानक ध्यान भटका देती है, जबकि मैसेज का जवाब वे अपनी सुविधा के मुताबिक बाद में भी दे सकते हैं।

सोशल मीडिया ने कैसे बदल दी बातचीत की आदत?

सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स ने बातचीत का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। अब लोग छोटे-छोटे मैसेज, emoji, GIF, Stickers और दूसरे विजुअल तरीकों से अपनी बात कहने लगे हैं। धीरे-धीरे फोन कॉल की जगह टेक्स्टिंग लेती जा रही है। इसका असर ये हुआ है कि आज के कई युवा कॉल की तुलना में मैसेज पर ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करते हैं। उन्हें ये सुविधा भी रहती है कि जब मन हो, तब जवाब दें और जल्दबाज़ी में प्रतिक्रिया ना देनी पड़े।

करियर और रिश्तों पर असर

टेक्स्टिंग सुविधाजनक जरूर है, लेकिन फोन कॉल से दूरी कई बार नुकसान भी पहुंचा सकती है। हालिया सर्वे में पाया गया कि बड़ी संख्या में युवा नौकरी, इंटरव्यू और दूसरे प्रोफेशनल मौकों में फोन पर बातचीत से बचते हैं, जिसका असर उनके करियर पर पड़ सकता है।

जानकारों का कहना है कि महत्वपूर्ण बातचीत केवल टेक्स्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए। फोन पर और आमने-सामने की बातचीत आत्मविश्वास बढ़ाने, रिश्तों को मजबूत करने और जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती है।

क्या टेलीफोबिया से बाहर निकला जा सकता है?

जानकारों के मुताबिक, टेलीफोबिया से बाहर निकलने के लिए छोटी-छोटी फोन कॉल्स से शुरुआत की जा सकती है। अगर बात करते समय कुछ भूल जाने का डर हो, तो जरूरी बातें पहले से लिखकर रखी जा सकती हैं। इसके अलावा दोस्तों और परिवार के लोगों से फोन पर बात करने की आदत डालना भी इस डर को कम करने में मददगार हो सकता है।

कंटेंट- नेहा कुमारी

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