कारगिल विजय दिवस 2026:कारगिल युद्ध के वो अनसुने किस्से, सुनकर चौड़ी हो जाएगी छाती

Kargil Vijay Diwas 2026: ये भारत है, जिसने ना कभी किसी दूसरे देश या क्षेत्र की भूमि पर कब्जा किया और ना ही किसी देश की शांति भंग की। लेकिन अगर किसी ने भारत की भूमि पर तिरछी निगाह भी रखी तो देश ने उस दुश्मन को मुंहतोड़ ऐसा जवाब दिया कि वो उसे तब तक याद रखेगा जब वो देश या वो इलाका दुनिया के नक्शे में मौजूद रहेगा। आज कारगिल विजय दिवस है। कश्मीर-लद्दाख समेत पूरे देश में इसे याद किया जा रहा है, उन योद्धाओं को याद किया जा रहा है जो भारत भूमि के लिए, अपनी भारत मां के लिए बलिदान हो गए, लेकिन इससे पहले उन्होंने दुश्मनों के प्राण भी हर लिए, क्योंकि उन्होंने भारत की तरफ तिरछी आंख से जो देखा था।
ये विजय दिवस सिर्फ पाकिस्तान पर भारतीय सेना की जीत का दिन नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस, त्याग और जज्बे को सलाम करने का अवसर है। इन वीर सपूतों ने 16 से 18 हजार फीट की ऊंचाई, माइनस तापमान और दुश्मन की गोलियों के बीच तिरंगा लहराया। 1999 में लगभग दो महीने तक चले ‘ऑपरेशन विजय’ के बाद भारत ने आज के ही दिन यानी 26 जुलाई को कारगिल की चोटियों पर फिर से अपना नियंत्रण स्थापित किया। ये बताते हुए आंखें नम हो जाती हैं लेकिन छाती गर्व से चौड़ी हो जाती है कि इस युद्ध में 527 भारतीय सैनिकों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया और 1300 से ज्यादा वीर सपूत घायल हुए। वैसे तो कारगिल युद्ध के कई किस्से इतिहास की किताबों में दर्ज हैं लेकिन हम आपको कुछ ऐसी प्रेरक घटनाओं के बारे में बता रहे हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
1. जब एक चरवाहे ने सेना को बताया दुश्मन की घुसपैठ के बारे में
पाकिस्तान की तरफ से भारतीय सीमा में घुसपैठ की सूचना सेना को कैसे मिली, ये बड़ा रोचक किस्सा है। एक स्थानीय चरवाहे जिसका नाम ताशी नामग्याल, उसने सेना के जवानों को दुश्मन की घुसपैठ के बारे में बताया था। 3 मई 1999 को ताशी ने कारगिल की पहाड़ियों पर घुसपैठियों की संदिग्ध गतिविधियां देखीं। बिना देर किए और बिना किसी हिचकिचाहट और घबराहट और इसकी सूचना भारतीय सेना को दी। तब इसकी जांच शुरु हुई और पता चला कि कि कोई आतंकी नहीं बल्कि देश की संप्रभुता को छीनने के इरादे से आ रहे पाकिस्तानी इसके बाद घुसपैठिए सामान्य आतंकवादी नहीं बल्कि पाकिस्तानी सैनिक थे, जिन्होंने भारतीय चौकियों पर कब्जा कर लिया था। इसी खबर ने आगे चलकर ऑपरेशन विजय की नींव रखी।
2. दुश्मन पर कर दी सीधी ‘चढ़ाई’
टाइगर हिल पर दुश्मन पर हमला भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे कठिन अभियानों में गिना जाता है। भारतीय जवानों ने उस दिशा से चढ़ाई की, जहां से हमला लगभग असंभव माना जाता था। रात के अंधेरे में रस्सियों के सहारे सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़ते हुए सैनिक दुश्मन तक पहुंचे और सुबह होते-होते भारतीय तिरंगा फहरा दिया। ये जीत युद्ध का निर्णायक मोड़ साबित हुई।
3. आसान नहीं था टाइगर हिल पर पहुंचना, कम होती जा रही थी ऑक्सीजन
कारगिल का युद्ध सिर्फ पाकिस्तान के खिलाफ नहीं था, बल्कि प्रकृति से भी लड़ाई थी। टाइगर हिल के कई मोर्चे 16,000 फीट से भी ज्यादा ऊंचाई पर थे, जहां ऑक्सीजन सामान्य से लगभग आधी होती है। जवानों के पास भारी-भारी हथियार थे और उन्हीं के साथ बर्फीली ढलानों पर चढ़ाई करनी पड़ती थी। कई सैनिक दुश्मन की गोली से पहले ऊंचाई और मौसम की चुनौती से जूझ रहे थे, लेकिन फिर भी उन्होंने अपना हौंसला नहीं खोया।
4. थल सेना के साथ जुड़ी वायुसेना, चलाया ऑपरेशन 'सफेद सागर'
थल सेना के साथ इस युद्ध भारतीय वायुसेना भी शामिल हुई। ऑपरेशन सफेद सागर के तहत पहली बार इतनी ज्यादा ऊंचाई वाले युद्धक्षेत्र में वायुसेना ने सटीक हवाई हमले किए। यहां की भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि बड़ों-बड़ों के हौंसले को पल में डुबा दे लेकिन ये भारत माता के वीर सपूत थे जिन्होंने इतनी गंभीर और विपरीत हालातों के बावजूद दुश्मन की सप्लाई लाइन और बंकरों को भारी नुकसान पहुंचाया।
5. भारतीय सेना ने दुश्मन सैनिकों का भी किया सम्मान
जब ये युद्ध समाप्त हो गया था तब कई पाकिस्तानी सैनिकों के शव लेने से पाकिस्तान ने शुरुआती दौर में इनकार कर दिया था। लेकिन ये भारत है। वो अपने सैनिकों के साथ-साथ दूसरे देश के सैनिकों का सम्मान करना भी जानता है और यही उसका धर्म है। इसी धर्म का पालन करते हुए भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय सैन्य परंपराओं का पालन करते हुए उन सैनिकों का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। जो भारतीय सैन्य पंरपरा की एक मिसाल मानी जाती है।
6. कारगिल ने बदल दी भारत की डिफेंस पॉलिसी
कारगिल युद्ध के बाद भारत को समझ में आया कि रक्षा क्षेत्र को मजबूत करना कितना जरूरी है। भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों में बड़े बदलाव किए। जैसे सीमावर्ती निगरानी, खुफिया तंत्र, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में युद्ध क्षमता, आधुनिक हथियारों और सैन्य समन्वय को मजबूत किया गया। रक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि कारगिल से मिले सबक ने आने वाले सालों में भारतीय सेना को ज्यादा सक्षम बनाया।
24 साल की उम्र में बलिदान देकर अमर हो गए कैप्टन विक्रम बत्रा
महज 24 साल के कैप्टन विक्रम बत्रा ने इस युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उन्होंने ऐसा युद्ध किया कि वो बलिदान देने के बाद भी अमर हो गए। वे 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के अधिकारी थे। उन्होंने पॉइंट 5140 पर हमले का नेतृत्व किया था और उसे दुश्मन से छुड़वाया था। इसी जीत के बाद उनका प्रसिद्ध रेडियो संदेश “ये दिल मांगे मोर” पूरे देश में गूंजा था। जिसने पूरे देश को गर्व, देशभक्ति से ओत-प्रोत कर दिया था।
7 जुलाई 1999 को पॉइंट 4875 की लड़ाई में वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बावजूद इसके वे अपने जवानों का नेतृत्व करते रहे और वहीं बलिदान दे दिया। उनके इस अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र दिया गया।
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