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रिश्वत दो...और हो जाओ बरी, कार्मिक विभाग में जांच के नाम पर केवल भ्रष्टाचार, IPS पंकज चौधरी पर 7 साल से विभागीय जांच लंबित, जानें पूरा मामला

रिश्वत दो...और हो जाओ बरी, कार्मिक विभाग में जांच के नाम पर केवल भ्रष्टाचार, IPS पंकज चौधरी पर 7 साल से विभागीय जांच लंबित, जानें पूरा मामला
राजस्थान
07 May 2026, 03:02 pm
रिपोर्टर : Rakesh Choudhary

IPS Pankaj Chaudhary: केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की जयपुर बेंच ने आईपीएस पंकज चौधरी निलंबन मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मामले में भ्रष्ट जांच अधिकारी अनिल अग्रवाल से कराई गई जांच को लेकर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि भ्रष्ट अधिकारी से जांच समझ से परे है। बता दें कि साल 2018 में राज्य सरकार की ओर से एक चार्जशीट पेश की गई जिसको कार्मिक विभाग ने कई सालों तक पेंडिंग रखा। जिन अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट थी उनमें पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के खासमखास माने जाने वाले तन्मय कुमार और आईपीएस राजीव दासोत का नाम शामिल था। इस पर निर्णय नहीं कर सरकार ने सवाल उठाने वाले आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी पर ही चार्जशीट बनवा दी।

अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार अधिकारियों के खिलाफ जांच को छिपाकर या लटकाकर अपने काले कारनामों पर पर्दा डालना चाहती है। इसके अलावा तो और कोई वजह नजर नहीं आती है। अब आप सोचिए जिन दागी अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट बनानी चाहिए और उनको सस्पेंड करना चाहिए था वे अभी सेवा में हैं और मलाई बटोर रहे हैं।

7 वर्षों से चल रही जांच

आईपीएस पंकज चौधरी मामले में कार्मिक विभाग लगता है जांच पर कुंडली मारकर बैठा है। पिछले करीब 7 वर्षों से कार्मिक विभाग जांच कर रहा है। कौनसी जांच कर रहा है? क्या जांच कर रहा है? पंकज चौधरी के खिलाफ एक पारिवारिक प्रकरण का मामला था जिसके आधार पर उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही की गई लेकिन जांच के नाम पर किसी अधिकारी को पोस्टिंग नहीं देना और प्रमोशन रोक देना कहां तक सही है। दूसरी तरफ आप भ्रष्ट अधिकारियों को लगातार प्रमोट कर रहे हो। आप जांच के नाम केवल लीपापोती करते हो। कार्मिक और पेंशन मंत्रालय के आदेशानुसार किसी भी अधिकारी के खिलाफ जांच 6 महीने में पूरी होनी चाहिए और अधिकतम 1 वर्ष निर्धारित है। इसके बावजूद पिछले 7 साल से गृह विभाग, सीएमओ और कार्मिक विभाग मानो कुंभकर्ण की नींद सो रहे हैं।

जांच अधिकारी पर ही भ्रष्टाचार का आरोप

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने हाल ही में पंकज चौधरी मामले को लेकर राज्य सरकार को प्रमोशन देने और आपसी सुलह से प्रकरण समाप्त कर कोर्ट को अवगत कराने का निर्देश दिया था। इस आदेश के 5 महीने बाद भी कार्मिक विभाग, गृह विभाग और सीएमओ की ओर से अब तक कोई आदेश पारित नहीं हुआ। अब जो अधिकारी नेताओं को मंथली बंधी दे, भ्रष्टाचार कराने में मदद करें, दलाली दें उन पर बैठाई गई जांच तो 2 महीने में पूरी हो जाती है लेकिन पंकज चौधरी जैसे अधिकारी पिछले 7 साल से बिना प्रमोशन और पोस्टिंग के बैठे हैं।

सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट की भी नहीं सुन रहा कार्मिक विभाग

अब सोचिए, जांच कर भी कौन रहा है जो खुद भ्रष्टाचार के मामले में सस्पेंड हो चुका हो। आईपीएस पंकज चौधरी ने कार्मिक विभाग के सचिव केके पाठक, तत्कालीन सीएस सुधांशु पंत को इस बारे में अवगत कराया गया था। इसके बावजूद जांच अधिकारी नहीं बदला गया। इतना ही नहीं सरकार के कारनामे सुनकर भी आप चौंक जाएंगे। जिस दागी अधिकारी से जांच कराई जा रही थी उसे मसूरी ट्रेनिंग में भेजा और हाल ही में डिविजनल कमिश्नर कोटा के पद भी पोस्टिंग दे दी। इससे पहले भी पंकज चौधरी के जांच अधिकारी रविशंकर श्रीवास्तव थे। वे भी करप्शन के मामले में जेल गए और 2004 से लेकर 2010 तक निलंबित रहे।

साल 2020 में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण नई दिल्ली, दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी जांच अधिकारी पर सवाल उठाए और पंकज चौधरी को साल 2020 में दोबारा बहाल करने का आदेश दिया। कुल मिलाकर सीएम भजनलाल शर्मा के दायित्व वाला कार्मिक विभाग भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। जिस किसी भी अधिकारी के खिलाफ जांच आती है तो जांच के नाम केवल लीपापोती होती है क्योंकि जांच की दिशा आरोप और गवाही से नहीं बल्कि पैसे से तय होती है। कोर्ट का यह महत्त्वपूर्ण निर्णय कार्मिक विभाग, गृह विभाग, मुख्य सचिव व मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।


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