CAG Report: गहलोत के 25 ऐलान जमीन पर नहीं उतरे, भजनलाल सरकार में 8,409 करोड़ का अतिरिक्त बजट भी नहीं खपाया

जयपुर। राजस्थान के बजट और सरकारी खर्च को लेकर नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी CAG की रिपोर्ट ने गहलोत से लेकर भजनलाल सरकार तक के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़े किए हैं। 21 अगस्त को विधानसभा में उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री दीया कुमारी ने CAG की राज्य वित्त रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल की बजट घोषणाओं के क्रियान्वयन की तस्वीर सामने आई है, तो दूसरी तरफ भजनलाल सरकार के पहले वित्तीय वर्ष में अतिरिक्त बजट के इस्तेमाल पर भी गंभीर सवाल उठे हैं।
सबसे बड़ा खुलासा ये है कि अशोक गहलोत सरकार के दौरान 25 बजट घोषणाएं ऐसी थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए जरूरी कदम ही नहीं उठाए गए। दूसरी तरफ भजनलाल सरकार के दौरान विधानसभा से 8,409.73 करोड़ का अतिरिक्त बजट मंजूर कराया गया, लेकिन इसके बावजूद मूल बजट की बड़ी राशि खर्च नहीं हो सकी।
गहलोत सरकार की 25 बजट घोषणाएं कागजों से आगे नहीं बढ़ीं
CAG के मुताबिक वर्ष 2019-20 से 2022-24 के बीच गहलोत सरकार की 25 बजट घोषणाएं ऐसी थीं, जिनको पूरा करने के लिए आगे की कार्रवाई नहीं की गई। यानी बजट में घोषणा हुई, लेकिन उसे लागू करने की दिशा में पर्याप्त कदम नहीं बढ़े।
ये आंकड़ा इसलिए अहम है क्योंकि बजट घोषणाएं सरकार की प्राथमिकताओं और विकास के रोडमैप का हिस्सा होती हैं। ऐसे में घोषणा के बाद उसे धरातल पर नहीं उतार पाना सीधे तौर पर बजट क्रियान्वयन और विभागीय मॉनिटरिंग पर सवाल खड़ा करता है।
भजनलाल सरकार में ₹8,409 करोड़ का अतिरिक्त बजट, फिर भी खर्च नहीं
CAG की रिपोर्ट में भजनलाल सरकार के पहले वित्तीय वर्ष के दौरान बजट प्रबंधन को लेकर भी बड़ा आंकड़ा सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार 21 मामलों में 8,409.73 करोड़ का अतिरिक्त बजट लिया गया, लेकिन इसके बावजूद मूल बजट में 21,591 करोड़ खर्च नहीं हो सके। यानी सरकार को अतिरिक्त राशि की जरूरत पड़ी, लेकिन दूसरी तरफ पहले से मंजूर बजट का बड़ा हिस्सा भी खर्च नहीं हुआ।
और मामला सिर्फ यहीं खत्म नहीं होता। CAG के मुताबिक 13 मामलों में 8,663.31 करोड़ का अतिरिक्त बजट मंजूर कराया गया, लेकिन यह राशि खर्च ही नहीं की गई। इससे बजट अनुमान, वास्तविक जरूरत और विभागों की खर्च करने की क्षमता के बीच तालमेल पर सवाल उठता है।
151 योजनाओं के 5,070 करोड़ खर्च नहीं हुए
CAG ने यह भी पाया कि राज्य के 60 विभागों की 151 योजनाओं के लिए स्वीकृत 5,070 करोड़ की राशि खर्च करने के बजाय वापस कर दी गई। ये स्थिति बताती है कि बजट में पैसा रखने के बावजूद कई योजनाओं को समय पर लागू नहीं किया जा सका या उनके लिए स्वीकृत राशि का इस्तेमाल नहीं हो पाया।
यानी रिपोर्ट की तस्वीर में दोनों सरकारों के लिए अलग-अलग सवाल सामने आते हैं। गहलोत सरकार के मामले में घोषणाओं के क्रियान्वयन पर सवाल है, जबकि भजनलाल सरकार के मामले में बजट के अनुमान और वास्तविक खर्च के बीच बड़ा अंतर सामने आया है।
नियमित खर्च के लिए RBI से 133 बार एडवांस
CAG रिपोर्ट में राजस्थान की वित्तीय स्थिति का एक और अहम पहलू सामने आया है। वर्ष 2024-25 में नियमित खर्चों को पूरा करने के लिए राज्य सरकार ने RBI से 133 बार अग्रिम सुविधा का इस्तेमाल किया और कुल 271 दिनों तक इस सुविधा पर निर्भर रहना पड़ा। इसके लिए करीब 180-181 करोड़ रुपए ब्याज का भुगतान किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार 2020-21 से 2024-25 के दौरान राज्य ने जो उधारी ली, उसका बड़ा हिस्सा परिसंपत्तियां बनाने के बजाय पुराने कर्ज चुकाने और नियमित खर्चों की जरूरत पूरी करने में इस्तेमाल हुआ। सिर्फ 2024-25 में 42,090 करोड़ रुपए की उधारी नियमित खर्चों को पूरा करने में इस्तेमाल की गई।
राजस्थान की वित्तीय तस्वीर क्या कहती है?
CAG के आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में राजस्थान की GSDP यानी राज्य का सकल घरेलू उत्पाद 12.02 प्रतिशत की वार्षिक बढ़ोतरी के साथ 17.04 लाख करोड़ तक पहुंची। इससे पहले 2023-24 में GSDP की वार्षिक बढ़ोतरी 12.17 प्रतिशत रही थी। हालांकि इसी अवधि में राज्य का राजस्व घाटा 41,950 करोड़ रहा, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 7.69 प्रतिशत ज्यादा था।
यानी राजस्थान की अर्थव्यवस्था की विकास दर मजबूत दिखने के बावजूद सरकारी खर्च और वित्तीय प्रबंधन के मोर्चे पर CAG ने कई ऐसी कमियां दर्ज की हैं, जिन पर सरकार को जवाब देना होगा।
घोषणा से खर्च तक सरकार कितनी जवाबदेह?
CAG रिपोर्ट की सबसे अहम तस्वीर यही है कि बजट में घोषणा करना और बजट में पैसा रखना अपने आप में योजना की सफलता नहीं है। गहलोत सरकार की 25 घोषणाओं का क्रियान्वयन नहीं हुआ, जबकि भजनलाल सरकार के कार्यकाल में अतिरिक्त बजट लेने के बावजूद मूल बजट की बड़ी राशि खर्च नहीं हो सकी।
अब राजनीतिक तौर पर ये रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजस्थान में निकाय और पंचायतीराज चुनावों का माहौल है। ऐसे समय में बजट घोषणाओं, उनके क्रियान्वयन और सरकारी खर्च के आंकड़े सीधे राजनीतिक बहस का मुद्दा बन सकते हैं।
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