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फीका पड़ा जादूगर का जादू! खुद के गढ़ में मेयर तक नहीं बनवा पाए गहलोत

फीका पड़ा जादूगर का जादू! खुद के गढ़ में मेयर तक नहीं बनवा पाए गहलोत
राजनीति
25 Sept 2026, 04:18 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

जोधपुर... राजस्थान की सियासत में वो शहर, जिसे लंबे समय से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता रहा है। लेकिन अब इसी जोधपुर में नगर निगम की मेयर की कुर्सी बीजेपी के खाते में चली गई है। बीजेपी के प्रसन्नचंद मेहता ने कांग्रेस के राजेंद्र सोलंकी को 53-47 के अंतर से हरा दिया। सवाल सिर्फ 6 वोटों का नहीं है, सवाल ये है कि आखिर गहलोत के गढ़ कहे जाने वाले जोधपुर में कांग्रेस मेयर की कुर्सी तक क्यों नहीं पहुंच पाई?

पहला फैक्टर- निर्दलियों को जोड़ नहीं पाई कांग्रेस

100 वार्ड वाले जोधपुर नगर निगम में चुनाव के बाद बीजेपी के पास 45 पार्षद थे, कांग्रेस के 44. 10 निर्दलीय और एक अन्य पार्षद के साथ किसी भी पार्टी के पास बहुमत नहीं था।

यानी मेयर चुनाव की चाबी उन पार्षदों के हाथ में थी, जो बीजेपी और कांग्रेस से बाहर थे। यहीं से शुरू हुआ असली सियासी खेल। बीजेपी ने निर्दलीय पार्षदों को अपने साथ जोड़ने में बढ़त बनाई और मतदान में प्रसन्नचंद मेहता को 53 वोट मिले। कांग्रेस के राजेंद्र सोलंकी 47 वोट ही जुटा पाए। हालांकि मतदान सीक्रेट था, इसलिए किस पार्षद ने किसे वोट दिया, ये निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता।

दूसरा फैक्टर- कैंडिडेट का चयन

बीजेपी ने प्रसन्नचंद मेहता को मैदान में उतारा, जो संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और RSS बैकग्राऊंड से आते हैं। वहीं कांग्रेस ने राजेंद्र सिंह सोलंकी को उम्मीदवार बनाया, जिन्हें गहलोत का करीबी माना जाता है। खास बात ये थी कि सोलंकी ने इस बार पार्षद का चुनाव भी नहीं लड़ा था।

तीसरा फैक्टर- कांग्रेस की गलत रणनीति!

तीसरा सवाल कांग्रेस की रणनीति पर है। खुद अशोक गहलोत ने निकाय चुनाव के दौरान कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पार्टी को ज्यादा आक्रामक प्रचार और बेहतर प्लानिंग करनी चाहिए थी। CM भजनलाल की तरह उन्हें भी रोड शो करना चाहिए था। उन्होंने निर्दलीयों की बड़ी संख्या पर भी सवाल उठाया।

तो जोधपुर का मेयर चुनाव एक बात साफ करता है- सिर्फ पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव काफी नहीं है। स्थानीय निकाय की राजनीति में संगठन, उम्मीदवार, निर्दलीयों का समर्थन और वोटों को सीटों में बदलने की रणनीति भी बड़ा उलटफेर कर देती है। यानी राजस्थान की सियासत के जादूगर का जादू उनके गढ़ जोधपुर तक में काम नहीं कर पाया।


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