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राजस्थान निकाय चुनाव: कांग्रेस ने 200 विधानसभा क्षेत्रों में उतारे चुनाव समन्वयक, 27 अगस्त तक मांगी ग्राउंड रिपोर्ट

राजस्थान निकाय चुनाव: कांग्रेस ने 200 विधानसभा क्षेत्रों में उतारे चुनाव समन्वयक, 27 अगस्त तक मांगी ग्राउंड रिपोर्ट
राजनीति
24 Aug 2026, 04:53 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

जयपुर। राजस्थान में नगर निकाय चुनाव का काउंटडाउन शुरू होते ही कांग्रेस ने अपनी चुनावी मशीनरी को जमीनी स्तर पर एक्टिव कर दिया है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने राज्य की सभी 200 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव समन्वयक (Election Co-ordinator) नियुक्त किए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की तरफ से 24 अगस्त को जारी आदेश में इन नियुक्तियों के साथ ही समन्वयकों को संबंधित विधानसभा क्षेत्रों में जाकर कार्यकर्ताओं और संभावित प्रत्याशियों से फीडबैक लेने की जिम्मेदारी दी गई है।

कांग्रेस का ये फैसला ऐसे समय आया है जब निकाय चुनाव की तारीखें सामने आ चुकी हैं। राज्य में नगर निकाय चुनाव दो चरणों में 9 और 11 सितंबर को होंगे, जबकि मतगणना और परिणाम 14 सितंबर को घोषित किए जाएंगे।

टिकट से पहले जमीन की रिपोर्ट, 3 दिन फील्ड में रहेंगे समन्वयक

कांग्रेस के आदेश के मुताबिक प्रदेश कांग्रेस के नियुक्त चुनाव समन्वयक 24, 25 और 26 अगस्त को अपने संबंधित विधानसभा क्षेत्रों में प्रवास करेंगे। इस दौरान वे ब्लॉक स्तर पर बैठकें आयोजित करेंगे और स्थानीय कांग्रेस नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से चुनावी स्थिति पर चर्चा करेंगे।

इस पूरी कवायद का सबसे अहम हिस्सा संभावित प्रत्याशियों को लेकर फीडबैक जुटाना है। यानी पार्टी टिकट घोषित करने से पहले स्थानीय स्तर पर ये जानना चाहती है कि कौन दावेदार संगठन में सक्रिय है, किसकी क्षेत्र में पकड़ है और किस उम्मीदवार के पक्ष में स्थानीय कार्यकर्ताओं का समर्थन है।

आगामी नगर निकाय चुनावों के लिए सभी विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव समन्वयक (Election Co-ordinator) की नियुक्ति की गई है।
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— Rajasthan PCC (@INCRajasthan) August 24, 2026

27 अगस्त तक डोटासरा को देनी होगी रिपोर्ट

प्रदेश कांग्रेस ने चुनाव समन्वयकों और जिला प्रभारियों के लिए समयसीमा भी तय कर दी है। आदेश के मुताबिक 24 से 26 अगस्त तक बैठकों और क्षेत्रीय प्रवास के बाद नगर निकाय चुनाव में प्रत्याशियों के उचित चयन से संबंधित स्थानीय निकाय स्तर की रिपोर्ट 27 अगस्त तक प्रदेश कांग्रेस कमेटी, जयपुर को सौंपनी होगी।

यानी कांग्रेस के पास टिकट वितरण से पहले अपने 200 विधानसभा क्षेत्रों से फीडबैक जुटाने के लिए बेहद कम समय है। पार्टी की यह कवायद संभावित उम्मीदवारों के चयन के साथ-साथ स्थानीय संगठन की स्थिति का आकलन करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

जिला प्रभारी और समन्वयक मिलकर करेंगे बैठकें

आदेश में जिला स्तर और विधानसभा स्तर की बैठकों की अलग-अलग जिम्मेदारी तय की गई है। जिला स्तर पर होने वाली बैठकों की अध्यक्षता संबंधित जिलाध्यक्ष करेंगे, जबकि विधानसभा स्तर की बैठकों की अध्यक्षता ब्लॉक अध्यक्ष करेंगे। जिला प्रभारी-सह प्रभारी और विधानसभा चुनाव समन्वयक इन बैठकों के जरिए स्थानीय चुनावी तैयारियों का जायजा लेंगे।

इस व्यवस्था से कांग्रेस ने टिकट चयन को सिर्फ प्रदेश मुख्यालय की कवायद बनाने के बजाय उसे स्थानीय संगठन और कार्यकर्ताओं के फीडबैक से जोड़ने की कोशिश की है।

कांग्रेस की रणनीति क्या है?

कांग्रेस के इस कदम को सिर्फ संगठनात्मक नियुक्ति के तौर पर देखना अधूरा होगा। निकाय चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई अक्सर वार्ड स्तर पर होती है, जहां पार्टी का चुनाव चिन्ह होने के बावजूद स्थानीय उम्मीदवार की छवि, व्यक्तिगत संपर्क और संगठन के साथ उसका तालमेल निर्णायक हो सकता है।

ऐसे में कांग्रेस ने प्रत्याशी चयन से पहले विधानसभा क्षेत्रवार समन्वयक नियुक्त करके स्थानीय फीडबैक जुटाने का मॉडल अपनाया है। हालिया रिपोर्टों में भी पार्टी के फोकस को मजबूत और जिताऊ उम्मीदवारों के चयन से जोड़ा गया है।

इस व्यवस्था की दूसरी अहम कड़ी ये है कि जिला प्रभारी, सह-प्रभारी और चुनाव समन्वयक एक साथ फील्ड में जाएंगे। इसका मकसद स्थानीय गुटबाजी और टिकट के दावेदारों के बीच खींचतान को समझना भी हो सकता है।

टिकट के दावेदारों की असली परीक्षा अब

नगर निकाय चुनाव में टिकट को लेकर कांग्रेस के भीतर बड़ी संख्या में दावेदार सामने आने की संभावना है। ऐसे में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये होगी कि स्थानीय स्तर के फीडबैक को टिकट बंटवारे में कितना महत्व दिया जाता है।

प्रदेश नेतृत्व ने 27 अगस्त की डेडलाइन देकर अब ये साफ कर दिया है कि चुनाव समन्वयकों को महज औपचारिक नियुक्ति नहीं दी गई है। उन्हें कुछ ही दिनों में ग्राऊंड में जाकर रिपोर्ट तैयार करनी होगी।

यानी आने वाले कुछ दिन कांग्रेस के टिकट दावेदारों के लिए बेहद अहम हैं। अब सिर्फ प्रदेश नेतृत्व से संपर्क या संगठन में पद होना पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय स्तर पर पकड़ और चुनाव जीतने की क्षमता का फीडबैक भी टिकट की दौड़ में मायने रख सकता है।

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