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विश्वेंद्र सिंह कांग्रेस छोड़ रहे हैं, उनके करीबी ने ‘हाथ’ थाम रहे, डोटासरा का ये कैसा सियासी दांव?

विश्वेंद्र सिंह कांग्रेस छोड़ रहे हैं, उनके करीबी ने ‘हाथ’ थाम रहे, डोटासरा का ये कैसा सियासी दांव?
राजनीति
09 Oct 2026, 03:03 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

राजस्थान में पंचायत चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने भरतपुर की सियासत में एक ऐसा दांव चला है, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ भरतपुर के दिग्गज नेता विश्वेंद्र सिंह कांग्रेस से अलग होने का ऐलान कर चुके हैं... तो दूसरी तरफ उनके करीबी रहे और भरतपुर के प्रभावी जाट नेता नेमसिंह फौजदार ने फिर से कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ये महज एक राजनीतिक वापसी है या फिर कांग्रेस भरतपुर की सियासत में कोई बड़ा समीकरण तैयार कर रही है।

दरअसल 8 अक्टूबर को पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने जयपुर में नेमसिंह फौजदार को कांग्रेस की सदस्यता दिलाई। फौजदार जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़े किसान नेता हैं और भरतपुर-डीग क्षेत्र में उनकी पहचान रही है।

गुरु-शिष्य जैसा रिश्ता था विश्वेंद्र सिंह और नेमसिंह फौजदार का

कहानी का दिलचस्प पहलू विश्वेंद्र सिंह और नेमसिंह फौजदार के पुराने रिश्ते हैं। जो कभी गुरु-शिष्य जैसा था। जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान विश्वेंद्र सिंह ने फौजदार को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई थी। लेकिन वक्त के साथ दोनों के बीच हितों का टकराव हुआ और दूरियां बढ़ती गईं। हाल के दिनों में भी दोनों के बीच बयानबाजी देखने को मिली। इसके बाद फौजदार की कांग्रेस में वापसी ने इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना दिया है। ऐसे में यहां कांग्रेस ने क्या गणित लगाया ये समझना तो बनता है।

भरतपुर-डीग में जाट वोट छिटकने से बचाना चाहती है कांग्रेस

पहला समीकरण है जाट वोट और स्थानीय पकड़, पंचायत चुनाव में जातीय समीकरण और स्थानीय नेताओं का प्रभाव अहम भूमिका निभा सकते हैं। जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़ी फौजदार की पहचान कांग्रेस को भरतपुर-डीग इलाके में अपने जनाधार को मजबूत करने का मौका दे सकती है। क्योंकि विश्वेंद्र सिंह तो कांग्रेस छोड़ने की बात कह चुके हैं तो उनके जाने से जो भरतपुर के जाट वोट छिटक सकते हैं, उन्हें नेम सिंह फौजदार के जरिए वापस पाने की ये जद्दोजहद कांग्रेस ने की है।

दूसरा समीकरण है संगठन को मजबूत करने की कोशिश चुनाव से पहले कांग्रेस उन नेताओं को वापस जोड़ना चाहती है, जो अलग-अलग समय पर दूसरे दलों के साथ रहे हैं। फौजदार की वापसी इसी रणनीति का हिस्सा हो सकती है।

इसलिए ऐसी भी सियासी चर्चा है कि फौजदार की वापसी सीधे विश्वेंद्र सिंह को चुनौती देने के लिए कराई गई है। लेकिन दोनों के बीच पुरानी तल्खी और डोटासरा के नेतृत्व में हुई इस वापसी ने राजनीतिक चर्चाओं को जरूर हवा दे दी है।

अब देखना होगा कि पंचायत चुनाव में नेमसिंह फौजदार कांग्रेस के लिए कितने प्रभावी साबित होते हैं और भरतपुर की सियासत में ये नया समीकरण पार्टी को कितना फायदा पहुंचाता है। क्योंकि राजस्थान की राजनीति में किसी नेता की एंट्री से ज्यादा चर्चा इस बात की होती है कि उसकी एंट्री किस वक्त हुई है...


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