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भजनलाल सरकार के ‘ग्रीन’ बजट का ‘काला सच’, भैराणा धाम में 21,300 पेड़ कटे, ग्रीन बजट का काला सच?

भजनलाल सरकार के ‘ग्रीन’ बजट का ‘काला सच’, भैराणा धाम में 21,300 पेड़ कटे, ग्रीन बजट का काला सच?
राजस्थान
13 May 2026, 11:34 am
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

Jaipur: जयपुर के दूदू के भैराणा धाम में संतों के अग्नितप की तपन शायद अभी तक सरकार तक पहुंची नहीं है। तभी तो प्रकृति के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई को वो इस तरह से नजरअंदाज कर रही है। लेकिन यहां बात सरकार के डबल स्टैंडर्ड की है। क्योंकि एक तरफ तो सरकार हरियाली और पेड़-पौधों के संरक्षण की बात करती है और दूसरी तरफ सरकार की नाक के नीचे ही हरी-भरी धरती को बंजर बनाया जा रहा है। एक तरफ सरकार हर मंच पर ‘एक पेड़ मां के नाम’ की बड़ी-बड़ी बातें करती है। 2025-26 के ग्रीन बजट में 10 करोड़ पौधे लगाने का ऐलान कर रही है और अगले 5 साल में 50 करोड़ का वादा भी सरकार ने किया है। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत ये सामने आई है कि जमीन पर वही पेड़, वही जंगल, वही बेजुबान—बिना आवाज के काटे जा रहे हैं।

ग्रीन बजट में 27,854 करोड़ रुपए जारी

ग्रीन बजट में 27,854 करोड़ रुपए जारी किए जाते हैं। दावा किया जाता है कि राजस्थान को हरा-भरा बनाएंगे। लेकिन दूदू के बिचून के आसपास क्या हो रहा है? भैराणा धाम में क्या हो रहा है? सिर्फ एक प्रोजेक्ट के लिए 610 बीघा जमीन से 21,300 पेड़ काट डाले गए और अगले चरण में 240 बीघा में 8,400 और पेड़ कटेंगे। यानी बयान हरियाली के, लेकिन जमीन पर जंगल साफ।

दरअसल रीको की सड़क परियोजना के खिलाफ भैराणा धाम में संतों का आंदोलन अब हठयोग में बदल चुका है। संत एक बात साफ कह रहे हैं कि विकास, विनाश बनकर नहीं आ सकता। परियोजना 850 बीघा में फैल रही है और संत इसे पर्यावरण के खिलाफ सीधा वार बता रहे हैं।

अब गर्मी बढ़ रही है, आंदोलन तेज हो रहा है लेकिन सरकार खामोश है। आखिर किस बात का इंतजार है सरकार को क्या सब कुछ खत्म हो जाने का टाइम देखा जा रहा है। 2023 में जो इलाका हरा-भरा था, अब वहां सिर्फ खाली मैदान है।

काट दिए गए औषधीय पेड़

कटाई में खेजड़ी, बबूल, झाड़बेरी, नीम, खैर, केर, गुग्गुलु, शंखपुष्पी, सतावरी जैसे औषधीय पेड़ काटे गए। यानी सिर्फ पेड़ नहीं, पूरे इकोसिस्टम की रीढ़ पर वार किया गया। पेड़ों की कटाई का सबसे बड़ा असर उन बेजुबानों पर पड़ा जिनका घर इन्हीं जंगलों में था। आंकड़े चौंकाते हैं—करीब 2 लाख वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास उजड़ रहा है। इससे एक हजार राष्ट्रीय पक्षी मोर, 1 लाख तितलियां, 80,000 मधुमक्खियां, 10 हजार गौरैया और दूसरी चिड़ियां, 28 सौ के आसपास खरगोश, भेड़िए समेत कई वन्य जीव और 3,500 से ज्यादा सरीसृपों को अपना घर छोड़ना पड़ा है। कुछ तो मर गए, कुछ रिहायशी इलाकों की तरफ चले गए जहां वे ज्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह पाएंगे।

यहां ध्यान दीजिए सरकार कि ये सिर्फ जीव नहीं—ये इस धरती की बायो डायवर्सिटी का आधार हैं और ये आधार टूट रहा है तो सरकार आप जवाब दें कि 10 करोड़ पौधे लगाने का दावा और लाखों जीवों का आवास उजाड़ने की कार्रवाई—दोनों साथ कैसे चल रहे हैं। क्या हरियाली सिर्फ भाषणों में है। क्या ग्रीन बजट सिर्फ कागजों की हरियाली है। सबसे बड़ा सवाल कि क्या विकास के नाम पर पर्यावरण को गिरवी रख दिया गया है। भैराणा धाम में संत लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि जल्दी कुछ नहीं किया तो बहुत बुरा हो जाएगा।


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