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जोजरी नदी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: 100 मीटर तक निर्माण पर रोक, 500 मीटर में प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर भी पाबंदी

जोजरी नदी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: 100 मीटर तक निर्माण पर रोक, 500 मीटर में प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर भी पाबंदी
राजस्थान
24 Aug 2026, 03:12 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

राजस्थान में जोजरी नदी के दायरे में 100 मीटर तक निर्माण पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने आज ये बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि फैक्ट्रियों के प्रदूषण से पर्यावरण को बड़ा नुकसान हो रहा है जिससे सराकर की कार्यशैली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। साथ ही कहा कि हाई फ्लड लाइन और जरूरी इकोलॉजिकल बफर जोन तय करने और उनकी सीमाएं निर्धारित करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया पूरी होने तक के लिए निर्माण पर रोक रहेगी। अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि जोजरी नदी के इकोसिस्टम को गंभीर नुकसान पहुंचा है। ऐसे में वैज्ञानिक अध्ययन पूरा होने तक नदी को तत्काल अंतरिम सुरक्षा देना जरूरी है। अदालत के इस आदेश ने राजस्थान में नदी संरक्षण, औद्योगिक प्रदूषण और सरकारी निगरानी व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

100 मीटर में अब कोई निर्माण नहीं

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक जोजरी नदी के किनारे से 100 मीटर की दूरी तक किसी भी प्रकार का निर्माण या विकास कार्य नहीं किया जा सकेगा। बता दें कि ये रोक कोर्ट का स्थायी फैसला नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक सीमांकन पूरा होने तक की अंतरिम व्यवस्था है। अदालत का उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि जब तक नदी की असली हाई फ्लड लाइन और उसके लिए जरूरी पर्यावरणीय सुरक्षा क्षेत्र तय नहीं हो जाता, तब तक नदी के आसपास ऐसी गतिविधियां ना हों, जिनसे स्थिति और बिगड़ सकती है।

500 मीटर तक भी कड़ी पाबंदी

सुप्रीम कोर्ट ने केवल निर्माण पर रोक नहीं लगाई है। जहां मौजूदा हाई फ्लड लाइन की पहचान हो चुकी है, वहां उसके दोनों तरफ 500 मीटर तक ऐसी किसी भी इंडस्ट्री या गतिविधि की अनुमति नहीं होगी, जिससे प्रदूषण या नदी के इकोसिस्टम को दूसरा कोई नुकसान होने की आशंका हो। ये आदेश खास तौर पर औद्योगिक इकाइयों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि जोजरी नदी का प्रदूषण लंबे समय से औद्योगिक अपशिष्ट और प्रदूषित जल से जुड़ा रहा है।

आखिर जोजरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट इतना सख्त क्यों?

जोजरी नदी का मामला केवल नदी के पानी की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी गई रिपोर्टों में राजस्थान के कई हिस्सों में जलस्रोतों के प्रदूषण, बिना ट्रीट किया हुआ औद्योगिक डिस्चार्ज, भूजल और कृषि भूमि पर प्रभाव, नदी तल और फ्लडप्लेन में संभावित अतिक्रमण और हाई फ्लड लाइन और बफर जोन की पहचान में कमियों जैसे गंभीर पर्यावरणीय मुद्दे सामने आए हैं। अदालत ने नियामकीय प्रवर्तन में भी इन गंभीर कमियों का जिक्र किया है।

यही वजह है कि अदालत अब केवल प्रदूषण रोकने के निर्देश देने तक सीमित नहीं है, बल्कि नदी के आसपास के पूरे इकोसिस्टम को सुरक्षित करने के लिए अंतरिम सुरक्षा क्षेत्र तैयार कर रही है।

पहले भी कह चुका है सुप्रीम कोर्ट- 'एक बूंद भी नहीं'

जोजरी मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह पहला सख्त आदेश नहीं है। 4 अगस्त को अदालत ने स्पष्ट किया था कि ट्रीटेड यानी टर्शियरी पानी की एक बूंद भी जोजरी नदी में नहीं छोड़ी जाएगी। अदालत ने ये भी कहा था कि ट्रीट किए पानी के फिर से इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम होना चाहिए, उसे नदी में बहाना समाधान नहीं है।

सरकार की कार्यशैली पर क्यों उठ रहे सवाल?

सुप्रीम कोर्ट की लगातार सख्त होती टिप्पणियों का सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक असर यही है कि राज्य की मौजूदा निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं। अगर किसी नदी में औद्योगिक प्रदूषण लंबे समय तक जारी रहता है, उसके आसपास अतिक्रमण और निर्माण की स्थिति बनती है और हाई फ्लड लाइन और इकोलॉजिकल बफर जोन का वैज्ञानिक सीमांकन समय पर नहीं हो पाता, तो स्वाभाविक सवाल ये है कि संबंधित सरकारी एजेंसियों की निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था कितनी प्रभावी रही।


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