राजस्थान के अस्पतालों में दम तोड़ रहीं मां, कोटा में चौथी प्रसूता की भी मौत, जवाब दें चिकित्सा मंत्री खींवसर

राजस्थान में मां बनने की उम्मीद लेकर महिलाएं सरकारी अस्पतालों में पहुंचती हैं। लेकिन क्या वहां से उन्हें सुरक्षित घर लौटने की गारंटी मिल रही है? क्योंकि यहां के अस्पतालों में तो मांएं दम तोड़ रही हैं। इनके लिए कोटा काल बन रहा है। क्योंकि हर बार की तरह इस बार भी कोटा में एक और प्रसूता की मौत हो गई है, बच्चे ने गर्भ में ही दम तोड़ दिया, मां की हालत बिगड़ गई, किडनी खराब हो गई और आखिरकार इस मां की भी जान चली गई।
कोटा के सरकारी मेडिकल कॉलेज में ये बीते 16 अक्टूबर से 27 अक्टूबर यानी 11 दिनों में चौथी मौत है। आखिर इन मौतों की जवाबदेही कौन लेगा? अस्पताल प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग या फिर प्रदेश के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर...।
बच्चे की गर्भ में हुई मौत, बाद में मां की हालत खराब
बारां जिले के शाहाबाद क्षेत्र की रहने वाली रेशु का 13 अक्टूबर को कोटा के जेके लॉन अस्पताल में प्रसव हुआ। परिवार के मुताबिक, बच्चे की मौत गर्भ में ही हो गई थी। इसके बाद रेशु को कुछ दिन अस्पताल में भर्ती रखा गया और फिर न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल की सुपर स्पेशियलिटी विंग में शिफ्ट किया गया।
परिजनों का कहना है कि बीच में उसकी तबीयत कुछ सुधरी, लेकिन फिर पेट में दर्द शुरू हुआ। डॉक्टरों ने किडनी खराब होने की बात बताई और 27 अक्टूबर को रेशु ने दम तोड़ दिया।
मृतका का शव ले जाने को एंबुलेंस के भी मांगे पैसे!
इस दर्दनाक घटना के बाद परिवार का एक और आरोप है कि रेशु का शव ले जाने के लिए एंबुलेंसकर्मी पैसे मांग रहे हैं। अगर ये आरोप सही है, तो सवाल है कि सरकारी अस्पताल में इलाज के बाद अपनों को खो चुका गरीब परिवार शव घर ले जाने के लिए भी पैसे कहां से लाए। प्रशासन बताए, इस मामले में जांच और कार्रवाई कहां तक पहुंची।
इसी साल कोटा मेडिकल कॉलेज में मई महीने में 5 प्रसूताओं की मौतें हुई थी अक्टूबर में अब 4 और मौतें हो गई हैं। यानी कोटा के अस्पतालों ने पिछली घटनाओं से कोई भी सबक नहीं लिया।
इस साल 37 प्रसूताओं की हुई है मौत!
-इसी साल जुलाई में भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल के मातृ और शिशु चिकित्सालय में पांच प्रसूताओं की मौतें रिपोर्ट हुईं।
-बांसवाड़ा में भी चार मौतों की खबर सामने आई, जिनमें एक नाबालिग भी शामिल थी।
-इन घटनाओं पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी संज्ञान लिया था और मुख्य सचिव से रिपोर्ट मांगी थी।
-बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में भी सीजेरियन के बाद 3 प्रसूताओं की मौत हुई थी। जोधपुर, सीकर, डीडवाना, चित्तौड़गढ़ और जयपुर से भी प्रसव के दौरान या बाद में 10 प्रसूताओं की मौत हुईं।
सार्वजनिक हो जांच रिपोर्ट
आंकड़ा 37 हो या 47...यहां फोकस नंबर्स पर नहीं बल्कि हर एक जिंदगी पर है। हर मौत अपने पीछे एक परिवार, एक सवाल और जवाबदेही की मांग छोड़ती है। संक्रमण की आशंका हो, ऑपरेशन थिएटर की सुरक्षा हो या इलाज में देरी के आरोप हो, ये जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होना और कार्रवाई का हिसाब देना जरूरी है।
तो इसका सवाल चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर से तो होना ही चाहिए कि प्रसूताओं की मौतों के बाद सरकार की जिम्मेदारी क्या सिर्फ जांच कमेटियां बनाने तक ही सीमित है? जुलाई में इन्होंने कहा था कि संक्रमण नियंत्रण, ANC मॉनिटरिंग और रेफरल व्यवस्था को सुधारा जाएगा। लेकिन अब कोटा में फिर मौतें हो रही हैं, इसका मतलब आपके मंत्री के आदेशों को ना तो अधिकारियों ने माना और ना ही अस्पतालों ने।
सरकारी अस्पतालों में सुरक्षित प्रसव कोई एहसान नहीं है। ये जनता का अधिकार है। इसलिए जवाबदेही है शासन और प्रशासन की है कि राजस्थान की माताओं की जान की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा? इन मौतों के पीछे कौन जिम्मेदार है इसकी जांच जल्द से जल्द शुरु होनी चाहिए।
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