क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस में बगावत, टॉप लीडर्स के आदेश के बावजूद नहीं माने पार्षद?

राजस्थान के निकाय चुनाव में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल अब हार का नहीं…अपने ही पार्षदों के भरोसे का है। क्योंकि एक के बाद एक निकाय में कांग्रेस के पार्षदों के वोट बीजेपी के खाते में जाते दिखाई दिए। पाली का उदाहरण लेते पहले क्योंकि यहां का नतीजा चौंकाने वाला था। यहां कांग्रेस के 29 पार्षद थे लेकिन मेयर चुनाव में उसे सिर्फ 3 ही वोट मिले और बीजेपी 33 वोटों के साथ मेयर कुर्सी खींचकर ले गई।
जयपुर में बीजेपी के 78 पार्षद थे, लेकिन उसके मेयर प्रत्याशी सुनील कोठारी को 89 वोट मिले। कांग्रेस की सुनीता मावर को 60 वोट मिले और एक वोट NOTA को गया।
लेकिन कोटा का मामला कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा चुभने वाला है। 100 सदस्यीय बोर्ड में बीजेपी के 57 और कांग्रेस के 39 पार्षद हैं। बीजेपी की अनुसुईया गोस्वामी को 65 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की सुनीता सुमन को सिर्फ 35 वोट..यानी बीजेपी के अपने संख्याबल से 8 वोट ज्यादा और कांग्रेस के संख्याबल से 4 वोट कम, इसी वोट गणित के आधार पर कांग्रेस के 4 पार्षदों के क्रॉस-वोट करने की चर्चा तेज हुई।
नतीजा ये हुआ कि जीत का अंतर 30 वोट का हो गया। कोटा नगर निगम में बीजेपी के 57 पार्षद थे, लेकिन उसके मेयर प्रत्याशी अनुसूया गोस्वामी को 65 वोट मिले। यानी वोटों का गणित साफ बता रहा है कि कांग्रेस के खेमे में सेंध लगी। कांग्रेस के लिए परेशानी सिर्फ कोटा तक सीमित नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 113 निकायों में क्रॉस-वोटिंग या पार्टी लाइन से अलग मतदान का मामला सामने आया है और करीब 346 कांग्रेस पार्षदों के वोट पार्टी के खिलाफ जाने का दावा किया जा रहा है।
और अब आते हैं उस सवाल पर, जो कांग्रेस के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा में है कि क्या दिल्ली से आया आदेश भी क्रॉस-वोटिंग रोक नहीं पाया? कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने राजस्थान पहुंचकर राज्य के टॉप लीडर्स के साथ चुनावी नतीजों और संगठन की स्थिति पर चर्चा की। क्रॉस वोटिंग को लेकर चेताया भी गया था।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा लगातार जांच और रिपोर्ट की बात करते रहे। लेकिन दूसरी तरफ निकायों में वोटों का गणित कांग्रेस की चिंता बढ़ाता रहा।
यानी सवाल यही है—आदेश दिए गए, रिपोर्ट मांगी गई, लेकिन क्या जमीन पर कांग्रेस अपने पार्षदों को एकजुट रख पाई? तो राजस्थान निकाय चुनाव ने कांग्रेस के सामने सिर्फ हार का सवाल नहीं खड़ा किया है। सवाल ये है कि पार्टी के पास पार्षदों की संख्या थी, लेकिन क्या वो संख्या वोट में बदल पाई?
वेणुगोपाल के आदेश, डोटासरा की जांच और पार्टी की रिपोर्ट—इन सबके बावजूद अगर बार-बार वोटों का गणित कांग्रेस के खिलाफ जाता है, तो असली चुनौती अब संगठन को एकजुट रखने की है और सबसे बड़ा सवाल- क्या कांग्रेस इन क्रॉस-वोटिंग मामलों में कार्रवाई करेगी, या फिर रिपोर्टें फाइलों में ही रह जाएंगी?
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