राजस्थान पंचायत चुनाव में दिग्गजों की साख दांव पर, इन नेताओं के चेहरे पर चुनाव

राजस्थान के पंचायत चुनाव में मुकाबला सिर्फ जिला परिषद और पंचायत समिति की सीटों का नहीं है। बल्कि सियासत के दिग्गजों की प्रतिष्ठा का भी है। बीजेपी हो या कांग्रेस... दोनों ही पार्टियों के 40 से ज्यादा बड़े नेता ऐसे हैं, जो पूरे प्रदेश में प्रचार की कमान संभालने के बजाय अपने परिवार के सदस्यों को जिताने में जुटे हैं।
किसी ने बेटे को चुनाव मैदान में उतारा है, तो किसी ने बेटी, पत्नी या बहू पर दांव खेला है। यानी पंचायत चुनाव में नेताओं की सियासत अब परिवार की जीत और हार से जुड़ गई है। लेकिन सवाल ये है कि आखिर इन नेताओं ने अपने परिजनों के लिए इतनी ताकत क्यों झोंक रखी है?
परिवार के सदस्यों के टिकट के लिए की पैरवी
दरअसल, टिकट वितरण के दौरान कई नेताओं ने अपने परिवार के सदस्यों के लिए टिकट की पैरवी की। पार्टी के भीतर दूसरे दावेदारों की नाराजगी के बावजूद जब टिकट परिजनों को दिला दिए गए, तो अब उन्हें जिताने की जिम्मेदारी भी इन्हीं नेताओं के कंधों पर है।
बीजेपी की बात करें तो नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा, राज्य मंत्री मंजू बाघमार, पूर्व सांसद कनकमल कटारा, संतोष अहलावत और कई अन्य दिग्गजों के परिजन चुनाव मैदान में हैं। वहीं, कांग्रेस में पूर्व मंत्री ममता भूपेश, गोविंद राम मेघवाल, महादेव सिंह खंडेला समेत कई बड़े नेताओं के परिवारों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। इतना ही नहीं, RLP प्रमुख और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल के परिजन भी चुनाव लड़ रहे हैं।
टिकट नहीं मिलने से बागी हो रहे नेता
लेकिन इन नेताओं की राह इतनी आसान भी नहीं है। टिकट नहीं मिलने से नाराज बागी उम्मीदवार चुनौती दे रहे हैं। वहीं,RLP और BAP की सक्रियता ने कई इलाकों में मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। अब इस चुनाव के नतीजे सिर्फ पंचायत की सीटों का हिसाब नहीं बताएंगे, बल्कि नेताओं की राजनीतिक ताकत का भी इम्तिहान लेंगे। क्योंकि इन चुनावों को आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
ऐसे में परिजन की जीत नेताओं का कद बढ़ा सकती है, जबकि हार के बाद टिकट वितरण से लेकर उनकी राजनीतिक रणनीति तक पर सवाल उठ सकते हैं। अब देखना होगा कि पंचायत चुनाव में परिवारवाद का दांव कितना सफल होता है और कितने दिग्गज अपनी सियासी साख बचा पाते हैं।
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