राज्यसभा नहीं तो क्या? राजेंद्र राठौड़ के लिए बीजेपी का बड़ा प्लान तैयार!

Rajendra Rathore: राजस्थान बीजेपी की राजनीति में एक ऐसा नाम, जिसने करीब पांच दशक तक संगठन और चुनावी रणनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। सात बार विधायक, दो बार मंत्री, नेता प्रतिपक्ष, उपनेता प्रतिपक्ष, बीजेपी की कोर कमेटी के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शामिल राजेंद्र राठौड़। लेकिन सवाल ये है कि आखिर इतना बड़ा राजनीतिक कद होने के बावजूद उन्हें लगातार दूसरा बड़ा मौका क्यों नहीं मिला। पहले लोकसभा टिकट नहीं मिला और अब राज्यसभा का टिकट भी हाथ से निकल गया। क्या बीजेपी ने राजेंद्र राठौड़ को साइडलाइन कर दिया है। या फिर पार्टी उनके लिए कुछ और बड़ा सोच रही है।
सतीश पूनिया के साथ राजेंद्र राठौड़ को पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी
दरअसल, 2023 के विधानसभा चुनाव में तारानगर सीट से राजेंद्र राठौड़ की हार राजस्थान की राजनीति का सबसे बड़ा उलटफेर मानी गई थी। उस समय राठौड़ नेता प्रतिपक्ष थे और उनकी हार ने बीजेपी के भीतर भी सभी को चौंका दिया था। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि उस चुनाव में नरेन्द्र बुडानिया की जीत से ज्यादा चर्चा राजेंद्र राठौड़ की हार की हुई थी। इसके बाद माना जा रहा था कि बीजेपी उन्हें लोकसभा चुनाव में जयपुर ग्रामीण या किसी दूसरी सीट से मौका दे सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी दौरान उनके साथ चुनाव हारने वाले सतीश पूनिया को धीरे-धीरे बड़ी जिम्मेदारियां मिलती चली गईं। हरियाणा जैसा अहम राज्य उनके हवाले किया गया। पूनिया ने वहां मेहनत की और बीजेपी की वापसी में उनकी भूमिका को भी सराहा गया। सिर्फ हरियाणा ही नहीं।बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक जैसे प्रदेशों की जिम्मेदारी भी उन्हें दी गई। लेकिन दूसरी तरफ राजेंद्र राठौड़ इंतजार करते रहे। फिर आया पश्चिम बंगाल चुनाव। यहीं से राठौड़ के राजनीतिक भविष्य को लेकर नई उम्मीदें पैदा हुईं।
बीजेपी ने उन्हें पश्चिम बंगाल की सबसे हाई प्रोफाइल और सबसे कठिन सीटों में से एक भवानीपुर भेजा। वही भवानीपुर, जहां मुकाबला था ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच। भवानीपुर सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं थी। बल्कि पूरे देश की नजरें इस सीट पर टिकी हुई थीं। बीजेपी ने वहां मारवाड़ी और खासकर शेखावाटी मूल के मतदाताओं को साधने के लिए राजस्थान के कई नेताओं की टीम भेजी थी। राजेंद्र राठौड़ उस टीम के प्रमुख चेहरों में शामिल थे और जब नतीजे आए। तो शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हरा दिया। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जीत के बाद खुद शुभेंदु अधिकारी ने मीडिया के सामने राजेंद्र राठौड़ का नाम लेकर उनकी भूमिका की सराहना की।
RCA की राजनीति में बेटे की एंट्री?
यहीं से राजस्थान की राजनीति में चर्चा शुरू हुई कि अब राठौड़ का राज्यसभा जाना लगभग तय है। सोशल मीडिया पर उनके समर्थक उत्साहित थे। बीजेपी के अंदर भी माना जा रहा था कि पार्टी इस योगदान का इनाम जरूर देगी। लेकिन 4 जून को जब राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची आई। तो राठौड़ का नाम उसमें नहीं था। यहीं से फिर सवाल उठने लगे। क्या बीजेपी राजेंद्र राठौड़ को भूल गई। लेकिन सूत्र कुछ और कहानी बता रहे हैं। जानकारों की मानें तो बीजेपी अभी भी राठौड़ को संगठन और सत्ता के किसी बड़े और सम्मानजनक पद पर बैठाने की तैयारी कर रही है। बताया जा रहा है कि इसकी शुरुआत राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन यानी RCA से हो सकती है। दिलचस्प बात यह है कि वर्तमान में RCA की राजनीति में भी राठौड़ परिवार का प्रभाव बढ़ रहा है। चर्चा है कि बीजेपी आने वाले समय में RCA की सत्ता में राजेंद्र राठौड़ के बेटे पराक्रम सिंह पर बड़ा दांव खेल सकती है। यानी राज्यसभा का टिकट भले नहीं मिला हो। लेकिन बीजेपी राठौड़ परिवार को पूरी तरह नजरअंदाज करने के मूड में नहीं दिख रही।
अब सवाल सिर्फ इतना है कि आखिर वह बड़ा पद क्या होगा। क्या राठौड़ को संगठन में राष्ट्रीय जिम्मेदारी मिलेगी। क्या उन्हें किसी राज्य का प्रभारी बनाया जाएगा या फिर राजस्थान की राजनीति में उनकी नई भूमिका देखने को मिलेगी। फिलहाल इतना तय है कि 7 बार के विधायक और बीजेपी के सबसे अनुभवी नेताओं में शामिल राजेंद्र राठौड़ का राजनीतिक अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है। राज्यसभा का रास्ता भले बंद हुआ हो। लेकिन बीजेपी की राजनीति में उनके लिए एक नया दरवाजा खुलने की तैयारी जरूर दिखाई दे रही है। अब देखना ये होगा कि पार्टी का अगला बड़ा दांव आखिर राजेंद्र राठौड़ पर कब और कैसे खेला जाता है।
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