सूबे के मुखिया को क्यों अखर रहा महिलाओं का घूंघट, नहीं बदल रही 'साहब' की सोच

राजस्थान की राजनीति में एक कहावत बड़ी मशहूर है। यहां हर पांच साल में राज बदल जाता है। लेकिन लगता है कि राज बदलने के बाद भी कुछ चीजें वैसी की वैसी ही रहती हैं। घूंघट पर भाषण दिए जाते हैं, बयानबाज़ी होती है। मानो प्रदेश की प्रगति इस तीन इंच के कपड़े में फंसी हुई हो। दरअसल बीते दिन बीजेपी के वर्तमान मुख्यमंत्री प्रतापगढ़ के बंबोली में रात्रि चौपाल सभा में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने एक महिला को घूंघट हटाने को कहा और पूछा कि क्या आपको कोई बैठा है यहां पर जिसका पर्दा किया है, ऐसा है तो जाओ पीछे बैठ जाओ। ये बात सीएम ने तब बोली जब ये महिला मुख्यमंत्री से संवाद कर रही थी।
कांग्रेस सरकार में भी देखी गई थी यही तस्वीर
अब थोड़ा पीछे जाएं तो कांग्रेस कार्यकाल में मुख्यमंत्री गहलोत ने भी एक महिला का घूंघट अपने हाथ से हटा दिया था। जिसे लेकर बीजेपी ने काफी विरोध जताया था और ये तक कह दिया था कि हिजाब के साथ मुख्यमंत्री ऐसा क्यों नहीं करते?
अब बात इस घूंघट की ही करते हैं। ये राजपूताना यानी राजस्थान, जहां रानी पद्मिनी ने जौहर किया वहां घूंघट सदियों से मर्यादा और अस्मिता का प्रतीक माना जाता है तो दूसरी तरफ इस्लाम में पर्दा और हिजाब कुरान का आदेश है। ये बात कुरान में लिखी हुई है जिसमें महिलाओं को गैर-महरम से अपना श्रृंगार ढंकने और सीने-गर्दन तक दुपट्टा रखने का निर्देश है।
ऐसे में सवाल है कि ये सियासतदानों के हाथ हमेशा सिर्फ घूंघट पर ही क्यों उठते हैं? अचानक आधुनिकता का पैमाना सिर्फ राजस्थान की महिला के सिर का कपड़ा बन जाता है। राजस्थान की महिला के लिए घूंघट कोई बेड़ी नहीं है। वो उसकी पसंद, उसकी परंपरा, उसके सम्मान का तरीका है। जो ये बात वर्तमान मुख्यमंत्री के सामने उस घूंघट वाली महिला ने कह भी दी।
घूंघट पर ही क्यों सियासत
घूंघट राजस्थान की मर्यादा है, पंरपरा है, अपने से बड़ों के लिए सम्मान का प्रतीक है। लेकिन राजनीतिक मंचों पर वही घूंघट “पिछड़ापन” कहकर खारिज कर दिया जाता है। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री कहते हैं कि घूंघट का जमाना गया और बीजेपी के वर्तमान सीएम मंच पर बोलती महिला को रोक तक देते हैं।
तो क्या ये नेतृत्व का दो रूप नहीं। एक तरफ आधुनिकता का भाषण, दूसरी तरफ संवाद का रास्ता रोक देना। महिला सशक्तिकरण घूंघट हटाने या रखने का मुद्दा नहीं—बल्कि उसे बिना रोके, बिना दबाव के बोलने देने का हक़ है।
राजस्थान की महिला ये तय करने के लिए किसी राजनीतिक सर्टिफिकेट की मोहताज़ नही है कि उसे क्या पहनना है, कैसे बैठना है, कैसे बोलना है। उसे चाहिए उसकी बात सुनने वाला सिस्टम। बिना टोके उसकी आवाज़ और उन विभागों से पर्दा हटाना जहां भ्रष्टाचार सालों से जमा है। उसका सम्मान तभी होगा जब उसकी बात सुनी जाए, न कि सिर्फ उसका घूंघट देखा जाए।
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