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रेप पीड़िता की अनचाही प्रेग्नेंसी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अबॉर्शन कानूनों पर केंद्र से मांगा जवाब, कहा - अपने कानून बदलो

रेप पीड़िता की अनचाही प्रेग्नेंसी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अबॉर्शन कानूनों पर केंद्र से मांगा जवाब, कहा - अपने कानून बदलो
राष्ट्रीय
30 Apr 2026, 05:27 pm
रिपोर्टर : Dushyant

Supreme Court Ruling for Abortion in Rape Pregnancy: एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़िताओं की अनचाही प्रेगनेंसी के अबॉर्शन के लिए बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने रेप प्रेगनेंसी से जुड़े कानून को और बेहतर और संवेदनशील बनाने पर जोर दिया और केंद्र सरकार को आदेश दिया कि बलात्कार पीड़िताओं के मामले में गर्भपात की समय-सीमा को लेकर कानून में बदलाव पर गंभीरता से विचार किया जाए।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने एक 15 वर्षीय नाबालिग बच्ची के रेप की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अगर गर्भावस्था का कारण रेप है, तो अबॉर्शन के लिए कोई समय-सीमा नहीं होनी चाहिए। कानून को समय के साथ बदलने की ज़रुरत है ताकि वो गतिशील रहे।

दरअसल, वर्तमान में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून के तहत किसी भी महिला के एबॉर्शन के लिए 20 हफ़्तों की प्रेगनेंसी की समय सीमा है। अगर प्रेगनेंसी को 20 हफ़्तों से ज्यादा बीत गए हैं, तो गर्भपात की अनुमति नहीं होती। रेप पीड़िताओं और कुछ विशेष मामलों के लिए कुछ विशेष प्रावधान हैं, लेकिन उसमें भी सीमा तय है।

ऐसे ही प्रकरणों को लेकर पीठ ने कहा कि अनचाही गर्भावस्था किसी भी महिला, खासकर नाबालिग बच्ची पर जबरन नहीं थोपी जा सकती। रेप पीड़िता पहले ही दर्द, अपमान और पूरी ज़िन्दगी मानसिक प्रताड़ना झेलती है। ऐसे में उस पर ज्यादा ज़ोर नहीं दिया जा सकता। जस्टिस ने कहा कि यह मामला एक बच्ची का है। उसे पढ़ना की ज़रुरत है, मां बनने की नहीं। अगर बच्ची को अबॉर्शन की अनुमति नहीं दी गई, तो यह बोझ जिंदगीभर उसके दुख की वजह बनेगा।

कोर्ट ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मामले में पीड़ित बच्ची की उम्र सिर्फ 15 साल थी और वह 30 हफ्ते से ऊपर की गर्भावस्था में थी। कोर्ट ने कहा कि प्रेगनेंसी को बरक़रार रखना है या गर्भपात करना है, यह फैसला पूरी तरह से पीडिता का ही होना चाहिए। कोर्ट ने पीड़िता को काउंसलिंग देने और बच्चे को गोद देने पर भी सोचने की बात कही।

आपको बता दें कि मामले में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और और जस्टिस उज्जल भुयान ने पहले भी 30 सप्ताह की प्रेगनेंसी को ख़त्म करने की इजाज़त दे दी थी, लेकिन AIIMS ने क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल करके फैसले का विरोध किया था, जिसको सुप्रीम कोर्ट ने वापस खारिज कर दिया और पहले दी गई गर्भपात की अनुमति को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से इन प्रावधानों की समीक्षा करने और रेप सर्वाइवर्स के लिए बेहतर और ज्यादा फ्लेक्सिबल कानून बनाने पर विचार करने को कहा है।


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