बेनीवाल का समर्थन सिर्फ नागौर तक बाहर तो बीजेपी ही रहेगी- ये क्या बोल रहे हैं हनुमान के समर्थक

Hanuman Beniwal: राजस्थान की राजनीति में खुद को 'किंगमेकर' और सबसे ज़्यादा TRP वाला नेता कहने वाले हनुमान बेनीवाल क्या अब अपने ही जाल में फंस गए हैं? RLP सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल, जो कल तक राजस्थान की सीमाओं के भीतर हुंकार भर रहे थे, अब बंगाल और तमिलनाडु की राजनीति में एंट्री मार चुके हैं। लेकिन उनकी ये एंट्री किसी धमाकेदार फिल्म जैसी नहीं, बल्कि एक भारी विवाद के साथ हुई है।
बेनीवाल ने सोशल मीडिया पर एक अपील की। उन्होंने बंगाल में ममता बनर्जी की TMC और तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की DMK को समर्थन देने का ऐलान किया। उन्होंने वहां रह रहे प्रवासी राजस्थानियों से अपील की कि वे बीजेपी के खिलाफ वोट करें लेकिन बेनीवाल को शायद ये अंदाजा नहीं था कि उनकी इस अपील पर खुद उनके समर्थक ही बागी हो जाएंगे।
क्या बोल रहे हैं यूजर्स
क्योंकि उनकी इस अपील पर सोशल मीडिया पर उनके समर्थक अजीब ही कमेंट कर रहे हैं। एक समर्थक लिखते हैं-"हम आपके साथ सिर्फ नागौर तक ही हैं... आगे चलने का कहोगे तो बीजेपी के साथ ही चलेंगे।" वहीं, एक और यूजर विष्णु बिश्नोई ने तो सीधे तौर पर बेनीवाल को नसीहत दे डाली। उन्होंने लिखा-"खींवसर में लोग बोलने से वोट नहीं देते...यानी अब ये सवाल लोग पूछ रहे हैं जो नेता राजस्थान में अपनी पार्टी को पूरी तरह खड़ा नहीं कर पाया, वो बंगाल और तमिलनाडु में वोट कटवा राजनीति क्यों कर रहा है?

विवाद यहीं नहीं रुका। सोशल मीडिया पर बेनीवाल को "बिन पेंदी का लोटा" तक कहा जा रहा है। वही एक यूजर ने उनकी विचारधारा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि एक तरफ आप कांग्रेस के खिलाफ दिखते हैं और दूसरी तरफ उसी गठबंधन के साथियों को समर्थन दे रहे हैं? यह विरोधाभास बेनीवाल की साख पर भारी पड़ रहा है। बेनीवाल का मुख्य वोट बैंक जाट समुदाय और युवा वर्ग है, जो विचारधारा के स्तर पर अक्सर बीजेपी के करीब रहता है। ऐसे में टीएमसी जैसी पार्टी को समर्थन देना, जिस पर हिंसा और तुष्टीकरण के आरोप लगते रहे हैं, बेनीवाल के समर्थकों के गले नहीं उतर रहा है।
बेनीवाल क्या नुकसान झेल सकते हैं?
सवाल यह भी है कि क्या बेनीवाल सिर्फ चर्चा में रहने के लिए ऐसे कदम उठा रहे हैं? जहां एक तरफ वो खुद को राजस्थान का सबसे बड़ा नेता बताते हैं, वहीं उनके ही पोस्ट पर लोग कह रहे हैं कि "राजस्थान में बेनीवाल को बहुत नुकसान होगा इस फैसले से।" क्या हनुमान बेनीवाल ने बंगाल और तमिलनाडु के चक्कर में अपने ही गढ़ में ज़मीन कमज़ोर कर ली है? क्या 'TMC' और 'DMK' का साथ देना बेनीवाल की राजनीतिक भूल साबित होगी? जनता जागरूक है वो सिर्फ अपने नेता के कहने पर वोट नहीं देती, वो विचारधारा और काम देख रही है। बेनीवाल ने किसानो का काफी साथ दिया है लेकिन सिर्फ उनके कहने पे उनके समर्थक किसी ऐसे पार्टी को नहीं लाना चाहते जिससे उनके राज्य का बेडा गर्क हो।
ये भी पढ़ें- 2028 में बीजेपी सरकार को टक्कर देने को तैयार गहलोत-पायलट की जोड़ी, आखिर क्या पक रहा है अंदरखाने में
इस लिंक को शेयर करें


