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Jaipur: बच्चों के मिड-डे-मील के दूध पर कैसे पड़ा डाका? क्यों नहीं बनाया निगरानी तंत्र

Jaipur: बच्चों के मिड-डे-मील के दूध पर कैसे पड़ा डाका? क्यों नहीं बनाया निगरानी तंत्र
जयपुर
30 Jul 2026, 12:58 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

Mid Day Meal Milk Scam in Jaipur: जिन मासूम बच्चों के पोषण के लिए सरकार स्कूल में दूध भेजती है, उनके हिस्से का वही दूध चुपचाप बाजार में डेयरियों को मावा बनाने के लिए बेचा जा रहा है। जयपुर के सामोद से जब से केस सामने आया, तब से राजस्थान की जनता में आक्रोश है। आम गरीब लोग जो अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं, सरकार उन बच्चों के मिड डे मील के लिए करोड़ों रुपए का बजट खर्च करती है तो इसके लिए कोई निगरानी तंत्र क्यों नहीं बनाती।

पन्नाधाय बाल गोपाल योजना में बांटा जाता है दूध

राज्य सरकार की पन्नाधाय बाल गोपाल योजना के तहत सरकारी स्कूलों के बच्चों को मुफ्त दूध उपलब्ध कराया जाता है। इस साल अप्रैल के बाद से प्रदेश के कई स्कूलों में बच्चों को यह दूध मिल ही नहीं रहा था। ये सरकारी दूध पाउडर चुपचाप कालाबाजारी के जरिए बाहर भेजा जा रहा था।

प्रारंभिक जांच के मुताबिक 3 हजार किलो दूध पाउडर बाजार में अवैध रूप से खपाया जा रहा था। चीथवाड़ी गांव में पुलिस ने जब छापेमारी की, तो एक पिकअप गाड़ी दूध पाउडर से भरी मिली और तीन संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। इस शर्मनाक घटना के बाद राजस्थान को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन (RCDF) ने सामोद थाने में FIR दर्ज कराई है, जिसने सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

सप्लाई चेन में कैसे इतनी बड़ी सेंध

ये तो कुछ नहीं प्रारंभिक जांच में जो खुलासे हुए हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं। पुलिस और शुरुआती पड़ताल में अंदेशा जताया गया है कि ये दूध पाउडर स्कूलों में बच्चों तक बांटने के बजाय सीधे बाजार और मावा भट्टियों तक पहुंचाया जाना था, जहां इससे मावा तैयार किया जाता। जिन लोगों को डेयरी से स्कूलों तक दूध पाउडर पहुंचाने का ठेका मिला हुआ था, वही इस कालाबाजारी में लिप्त पाए गए हैं। आरोपियों की खुद की मावा फैक्ट्री भी बताई जा रही है, जो इस अवैध खेल के बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करती है। वहीं जब्त किए गए पैकेट श्रीगंगानगर, भीलवाड़ा और जयपुर डेयरी से निर्मित बताए जा रहे हैं, जिससे ये सवाल उठता है कि सप्लाई चेन में इतनी बड़ी सेंध कैसे लग गई।

यह घटना सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र और सरकारी निगरानी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करती है। जब योजना के तहत स्कूलों में महीनों से दूध नहीं पहुंच रहा था, तो जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? क्या विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा खेल इतने लंबे समय तक चल सकता था? फिलहाल पुलिस इस पूरे गिरोह के नेटवर्क को खंगालने में जुटी है और उम्मीद की जा रही है कि पूछताछ के बाद इस अवैध कारोबार से जुड़े कई और बड़े चेहरे बेनकाब होंगे।

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