राजस्थान निकाय चुनाव: नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका में क्या अंतर? पार्षद से मेयर तक ऐसे चलता है पूरा सिस्टम

Rajasthan Nikay Elections 2026: राजस्थान में निकाय चुनाव का बिगुल बज चुका है। राज्य की 309 नगरीय निकायों में दो चरणों में मतदान होगा। पहले चरण में 9 सितंबर और दूसरे चरण में 11 सितंबर को वोट डाले जाएंगे, जबकि मतगणना 14 सितंबर को होगी।
निकाय चुनाव में आमतौर पर चर्चा पार्षद, मेयर, सभापति और चेयरमैन की होती है, लेकिन क्या आपको पता है कि नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका में असल अंतर क्या है? किस निकाय में कौन सा जनप्रतिनिधि चुना जाता है और उसके पास कितनी जिम्मेदारी होती है? सड़क, नाली, सफाई, स्ट्रीट लाइट, कचरा प्रबंधन जैसे काम आखिर किसके जिम्मे आते हैं?
तीन तरह के निकाय क्यों?
राजस्थान में शहरी क्षेत्रों के स्थानीय प्रशासन के लिए अलग-अलग स्तर के नगरीय निकाय हैं। राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 के तहत नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका या नगर बोर्ड जैसी व्यवस्थाएं हैं। राज्य का स्वायत्त शासन विभाग इन नगरीय निकायों के प्रशासन और निगरानी से जुड़ा प्रमुख विभाग है।
नगर निगम में मेयर और पार्षद चुने जाते हैं। नगर पालिका में सभासद और पालिका चेयरमैन चुने जाते हैं। वहीं नगर परिषद में सभापति चुने जाते हैं।
ध्यान रखने वाली बात ये है कि केवल आबादी ही किसी क्षेत्र को निगम, परिषद या पालिका बनाने का एकमात्र आधार नहीं है। कानून में शहरी क्षेत्र की आबादी के साथ उसकी जनसंख्या घनत्व, राजस्व क्षमता और दूसरी परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाता है। राज्य सरकार अधिसूचना के जरिए नगर निकायों का गठन और उनकी सीमाओं में बदलाव कर सकती है।
नगर निगम क्या होता है?
नगर निगम बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए बनाया जाता है। राजस्थान में जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर और बीकानेर जैसे बड़े शहर नगर निगम व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं। राजस्थान सरकार की मौजूदा ULB सूची यानी अर्बन लोकल बॉडी (शहरी निकाय) में इन निकायों को कॉर्पोरेशन के रूप में दर्ज किया गया है।
नगर निगम में जनता अपने-अपने वार्ड से पार्षद चुनती है। इन निर्वाचित पार्षदों से मिलकर नगर निगम का बोर्ड बनता है। नगर निगम के राजनीतिक प्रमुख को मेयर और उनके डिप्टी को डिप्टी मेयर कहा जाता है। राजस्थान नगरपालिका अधिनियम की धारा 43 में नगर निगम के लिए मेयर और डिप्टी मेयर का प्रावधान है।
मेयर क्या काम करता है?
मेयर नगर निगम के निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व का प्रमुख चेहरा होता है। वो निगम की बैठकों और राजनीतिक स्तर पर नगर निगम का नेतृत्व करता है। मेयर अकेले सड़क, नाली या सफाई का काम सीधे नहीं करवाता। इन सबके लिए संबंधित विभागीय प्रक्रिया, बजट और अधिकारियों की भूमिका भी होती है।
नगर परिषद क्या होती है?
नगर परिषद आम तौर पर नगर निगम से छोटे शहरी क्षेत्र के लिए होती है। राजस्थान में अलवर, भीलवाड़ा, बूंदी, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, पाली, सीकर, श्रीगंगानगर जैसे कई शहरी निकाय नगर परिषद हैं। राजस्थान सरकार की ULB सूची में अलग-अलग क्षेत्रों को कॉर्पोरेशन, काउंसिल और बोर्ड में बांटा गया है। यहां भी जनता वार्ड के हिसाब से पार्षद चुनती है। नगर परिषद के प्रमुख को सभापति और उप प्रमुख को उपसभापति कहा जाता है। नगर परिषद भी सड़क, नाली, सफाई, स्ट्रीट लाइट, कचरा प्रबंधन, सार्वजनिक सुविधाओं और स्थानीय शहरी विकास जैसे कामों के लिए जिम्मेदार होती है।
नगर पालिका क्या होती है?
नगर पालिका या Municipal Board छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए स्थानीय निकाय है। राजस्थान सरकार की ULB सूची में बगरू, चौमूं, सांभर, फुलेरा, पुष्कर, नसीराबाद, नोखा, पीपाड़ सिटी, बिलाड़ा जैसे कई क्षेत्रों को नगर पालिका के तौर पर लिस्ट किया गया है। नगर पालिका में भी जनता अपने वार्ड से पार्षद चुनती है। यहां निकाय के प्रमुख को चेयरमैन/पालिकाध्यक्ष और उप प्रमुख को वाइस चेयरमैन कहा जाता है। राजस्थान नगरपालिका अधिनियम की धारा 43 में Municipal Board के लिए Chairman और Vice-Chairman का प्रावधान है।
सबसे महत्वपूर्ण- जनता किसे चुनती है?
निकाय चुनाव में मतदाता मुख्य रूप से अपने वार्ड के पार्षद को चुनते हैं। राजस्थान नगरपालिका अधिनियम के मुताबिक नगरपालिका क्षेत्र को वार्डों में बांटा जाता है और नगरपालिका की सीटें वार्डों से सीधे चुनाव के जरिए भरी जाती हैं। यानी आपका वोट सबसे सीधे तौर पर आपके वार्ड के पार्षद को चुनता है।
जैसे अगर आप किसी नगर पालिका के वार्ड नंबर 10 में रहते हैं तो आप वार्ड 10 से चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में से एक को वोट देंगे। जीतने वाला व्यक्ति आपके वार्ड का पार्षद बनेगा। फिर यही पार्षद निकाय के बोर्ड का हिस्सा बनेगा।
फिर मेयर, सभापति या चेयरमैन कैसे बनता है?
ये 2026 के राजस्थान निकाय चुनाव में खास तौर पर महत्वपूर्ण सवाल है। राज्य सरकार ने इस बार मेयर, सभापति और पालिकाध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया को बदलकर फिर से पार्षदों के जरिए निकाय प्रमुख चुनने का फैसला किया है। यानी जनता सीधे प्रमुख को वोट नहीं देगी, पहले वार्ड पार्षद चुने जाएंगे और फिर निर्वाचित पार्षदों के जरिए निकाय प्रमुख का चुनाव होगा। इसका सीधा राजनीतिक मतलब यह है कि किसी पार्टी को सिर्फ ज्यादा पार्षद जिताने की जरूरत नहीं है, बल्कि बोर्ड के भीतर बहुमत का गणित भी बेहद अहम होगा।
जैसे मान लीजिए किसी नगर परिषद में 40 वार्ड हैं। चुनाव मे BJP के 21 पार्षद जीत गए, कांग्रेस के 17 पार्षद जीत गए, 2 निर्दलीय जीत गए तो निकाय के प्रमुख के चुनाव में इन पार्षदों की अहम भूमिका होगी। यही वजह है कि निकाय चुनाव में पार्षद का चुनाव उतना ही अहम है जितना विधानसभा चुनाव में विधायक का चुनाव।
पार्षद के पास कितनी ताकत होती है?
पार्षद अपने वार्ड की स्थानीय समस्याओं को नगर निकाय के सामने उठाता है। मसलन टूटी सड़क, नाली और जलभराव, स्ट्रीट लाइट, कचरा उठाने की व्यवस्था, सफाई, सार्वजनिक शौचालय, पार्क और सामुदायिक सुविधाएं,स्थानीय अतिक्रमण से जुड़े मुद्दे, पेयजल-सीवर जैसी शहरी सुविधाओं से जुड़े मामले।
लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। पार्षद किसी अधिकारी को अपनी जेब से पैसा देकर सड़क बनवाने का आदेश नहीं दे सकता। वो समस्या को बोर्ड, समिति और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के सामने रखता है। काम के लिए तकनीकी स्वीकृति, प्रशासनिक स्वीकृति, बजट और विभागीय प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है।
फिर अधिकारी क्या करते हैं?
यहीं से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों की भूमिका अलग होती है। नगर निकाय का राजनीतिक नेतृत्व जनता से जुड़ी प्राथमिकताएं तय करने और उन्हें बोर्ड या समितियों में आगे बढ़ाने में भूमिका निभाता है।
वहीं मुख्य नगर पालिका अधिकारी और दूसरे अधिकारी-कर्मचारी प्रशासनिक और कार्यान्वयन संबंधी जिम्मेदारियां निभाते हैं। राजस्थान नगरपालिका अधिनियम में Chief Municipal Officer की शक्तियों और कर्तव्यों के लिए अलग प्रावधान है।
निकाय चुनाव को विधानसभा चुनाव से अलग क्यों माना जाता है?
विधानसभा चुनाव में विधायक राज्य सरकार की नीतियों और कानून निर्माण से जुड़े बड़े मुद्दों पर काम करता है। निकाय चुनाव का फोकस ज्यादा स्थानीय होता है। जैसे आपके मोहल्ले की सड़क खराब है, नाली जाम है, कचरा नहीं उठ रहा समेत कई मुद्दे इसमें होते हैं।
2026 के राजस्थान निकाय चुनाव में क्यों महत्वपूर्ण है ये अंतर?
राजस्थान में इस बार 309 नगरीय निकायों में चुनाव होने हैं। 9 और 11 सितंबर को मतदान और 14 सितंबर को मतगणना होगी। ऐसे में मतदाताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि वे सिर्फ किसी पार्टी को वोट नहीं दे रहे हैं, बल्कि अपने वार्ड का ऐसा प्रतिनिधि चुन रहे हैं जो अगले कार्यकाल में स्थानीय समस्याओं को नगर निकाय के भीतर उठाएगा और इस बार निकाय प्रमुख का चुनाव भी निर्वाचित पार्षदों के जरिए होने के कारण एक-एक वार्ड का चुनाव पूरे नगर निकाय की सत्ता का समीकरण बदल सकता है।
ये भी पढ़ें- कैलाश वर्मा के साथ गाड़ी तोड़ने वालों की फोटो तो डोटासरा-जूली के साथ आशुतोष रांका की तस्वीर...सोशल मीडिया पर मच रहा बवाल
इस लिंक को शेयर करें

