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20,000 रुपए एक आदिवासी की कीमत, मध्य प्रदेश में बच्चों की मौत पर सरकार पर भड़के राजकुमार रोत

20,000 रुपए एक आदिवासी की कीमत, मध्य प्रदेश में बच्चों की मौत पर सरकार पर भड़के राजकुमार रोत
राष्ट्रीय
24 Aug 2026, 03:57 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

बांसवाड़ा-डूंगरपुर सांसद ने सरकार से सीधा सवाल पूछा है कि क्या हमारे देश में मासूम ज़िंदगियों का मोल सिर्फ 20,000 रह गया है? उन्होंने ये सवाल मध्य प्रदेश में बीमारियों से मौत के मुंह में जा रहे बच्चों के लिए उठाया है। जिनके पीड़ित परिवारों को सरकार 20 हजार रुपए दे रही है।

मलेरिया जैसी बीमारियों से मर रहे बच्चे

दरअसल मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले के बिरसा और बैहर ब्लॉक से आ रही तस्वीरें किसी का भी कलेजा कंपा देने के लिए काफ़ी हैं। विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा प्राप्त ‘बैगा आदिवासी’ समुदाय के मासूम बच्चे एक-एक करके मौत के आगोश में समा रहे हैं, और सरकारी तंत्र लाचार नज़र आ रहा है।

ताज़ा जानकारी के मुताबिक, भारत सरकार की तरफ से 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' घोषित बैगा समुदाय के कई गांवों में मानसून के दौरान मलेरिया, टाइफाइड और वायरल इंफेक्शन का भयंकर प्रकोप फैला हुआ है। अब तक 7 से ज्यादा मासूम आदिवासी बच्चों की मौत की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है, जबकि दर्जनों बच्चे अस्पतालों में जीवन और मौत की जंग लड़ रहे हैं।

25 की मौत, 50 से ज्यादा गंभीर बच्चे

इसी को लेकर बांसवाड़ा से सांसद और भारत आदिवासी पार्टी के नेता राजकुमार रोत ने सोशल मीडिया के ज़रिए इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि 25 के करीब बच्चों की जान जा चुकी है और 50 से ज्यादा मासूम गंभीर हालत में हैं। उन्होंने सीधा सवाल दागा है- 'जो सरकारें आदिवासी विकास का ढिंढोरा पीटती हैं, क्या उनकी नज़र में आदिवासी बच्चों की जान की कीमत महज़ 20 हजार रुपये का चेक है?'

प्रशासनिक अफसरों का दावा है कि दूर-दराज के दुर्गम इलाकों, मोबाइल नेटवर्क की कमी और स्थानीय स्तर पर झाड़-फूंक पर निर्भरता की वजह से इलाज समय पर नहीं पहुंच पा रहा। लेकिन सवाल ये है कि जब ये इलाके और उनकी चुनौतियां नई नहीं हैं, तो मानसून से पहले स्वास्थ्य टीमों और एम्बुलेंस का पुख्ता इंतज़ाम क्यों नहीं किया गया? और क्या सिर्फ 20-20 हज़ार का मुआवज़ा देकर पीड़ित परिवारों के घावों पर मरहम लगाया जा सकता है?

लोगों का कहना है कि आदिवासी समाज सिर्फ़ चुनावों में वोट बैंक नहीं है, वे इस देश के मूल निवासी हैं। बालाघाट के दूर-दराज जंगलों में तड़पते उन मासूमों को भाषणों की नहीं, डॉक्टरों, दवाओं और शुद्ध पेयजल की सख्त ज़रूरत है। शासन-प्रशासन को कागज़ी दावों से बाहर निकलकर तुरंत मेडिकल इमरजेंसी स्तर पर काम करना होगा ताकि और मासूम चिराग ना बुझें।

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