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राजस्थान निकाय चुनाव: जनादेश बनाम सत्ता का दबाव? क्या बीजेपी सरकार कर रही लोकतंत्र का चीरहरण

राजस्थान निकाय चुनाव: जनादेश बनाम सत्ता का दबाव? क्या बीजेपी सरकार कर रही लोकतंत्र का चीरहरण
राजनीति
21 Sept 2026, 03:30 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

राजस्थान में निकाय चुनाव खत्म हो चुके हैं और आज 273 निकायों के अध्यक्ष चुने जा रहे हैं। लेकिन असली सियासी खेल जो चल रहा है बोर्ड बनाने का। वो अब बेहद गंदगी में डूबता जा रहा है। क्योंकि राजस्थान की सत्ता जनता के जनादेश को स्वीकार ही नहीं कर पा रही है। विपक्ष कह रहा है कि बोर्ड बनाने की ये लड़ाई बीजेपी को इस हद तक गिरा देगी ये तो किसी ने नहीं सोचा था। अपना मेयर, अध्यक्ष बनाने की जंग कुचेरा, भरतपुर से लेकर हनुमानगढ़, बीकानेर और दूनी तक ऐसे मामले आ चुके हैं, जिन पर लोकतंत्र और जनादेश को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

रात के 10 बजे खुले हाईकोर्ट के दरवाजे

हनुमानगढ़ में निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल की गिरफ्तारी हुई। उनके समर्थक पार्षदों पर भी पुलिस कार्रवाई की आशंका बनी और मामला इतना गंभीर हुआ कि रविवार की छुट्टी के दिन रात 10 बजे राजस्थान हाईकोर्ट के दरवाजे खोलने पड़े। कोर्ट में देर रात तक सुनवाई चली और हनुमानगढ़ के 9 पार्षदों की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी गई।

तो सवाल यही है कि क्या ये सिर्फ कानूनी कार्रवाई है या फिर बीजेपी सरकार की चुनावी चाल, क्योंकि 23 साल पुराने मामले को अध्यक्ष चुनाव के एक दिन पहले खोलने की य़ाद बीजेपी को कैसे आ गई? और उससे भी बड़ा सवाल कि अगर जनता ने अपना जनादेश दे दिया है, तो क्या उस जनादेश को पुलिस और प्रशासनिक कार्रवाई सेप्रदेश सरकार प्रभावित करने की कोशिश कर रही है?

भरतपुर में सबसे चौंकाने वाली उलटफेर

राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के बाद प्रदेश में जो सियासी हालात पैदा हुए हैं, उसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया। शुरुआत हुई भरतपुर से जहां के 235 वार्ड में निर्दलियों ने बीजेपी और कांग्रेस को जबरदस्त पटखनी दी और सभी निकायों में अपना झंडा गाड़ा, 7 निकायों में बीजेपी के सिर्फ 66 प्रत्याशी जीते जबकि 152 निर्दलीय जीते, यानी 235 वार्ड में निर्दलियों ने अपना दम दिखा दिया। कहा जा रहा था कि हर निकाय में बोर्ड तो निर्दलिय़ों का ही बनेगा लेकिन नगर निगम में जिस तरह से निर्दलीय विचित्रा सिंह ने अपना नामांकन वापस लिया, उसने सभी को हैरान कर दिया, कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है, कि जिस पार्टी या जिस प्रत्याशी को खुद जनता ने नहीं चुनाव उसे सत्ता के मद में चूर होकर जनता के सिर पर बिठाया जाए। कांग्रेस ने तो बयान दिए कि भाजपा सत्ता के लिए लोकतंत्र की हत्या पर उतारू हो गई है। बीजेपी याद रखे कि पुलिस के दम पर वोट नहीं लूटे जा सकते।

लेकिन यहां सवाल ये है कि जो कांग्रेस आज बीजेपी को इतना ज्ञान दे रही है, उसने खुद क्या किया था? इस पूरी कहानी को समझने के लिए सबसे पहले आपको राजस्थान की राजनीति का एक पुराना अध्याय याद दिलाना जरूरी है।

2020 की बाड़ेबंदी में कांग्रेस ने क्या किया था?

साल 2020, राजस्थान में अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार पर संकट था। सचिन पायलट खेमे की बगावत के बीच सरकार के पास बहुमत बचाने की चुनौती थी। उस वक्त BTP के विधायक राजकुमार रोत और रामप्रसाद डिंडोर का समर्थन भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।

इसी दौरान राजकुमार रोत ने वीडियो जारी कर आरोप लगाया था कि पुलिस ने उन्हें जयपुर से अपने विधानसभा क्षेत्र जाने से रोका, उनकी गाड़ी को घेरा और उनकी कार की चाबी तक ले ली।

रोत ने इसे ऐसी स्थिति बताया था, जिसमें उन्हें बंधक जैसा महसूस हो रहा था। उस समय मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी दर्ज हुआ कि BTP ने गहलोत सरकार और सचिन पायलट दोनों से दूरी रखने की बात कही थी।

यानी सत्ता बचाने की लड़ाई में तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर भी पुलिस-प्रशासन के इस्तेमाल के आरोप लगे थे। लेकिन आज करीब छह साल बाद भी तस्वीर वही है, सिर्फ पार्टी बदली है।

23 साल पुराना मामला, चुनाव के एक दिन पहले क्यों याद आया

अब आते हैं हनुमानगढ़ पर.. क्योंकि कार्रवाई हुई है 23 साल पुराने मामले में। हनुमानगढ़ से निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल को सीआईडी-सीबी और स्पेशल क्राइम ब्रांच की टीम ने 2003 से जुड़े कथित फर्जी पट्टा मामले में गिरफ्तार किया। उन्हें शनिवार शाम बीकानेर से हनुमानगढ़ जाते समय हिरासत में लिया गया और पूछताछ के बाद गिरफ्तारी की गई। सरकार और जांच एजेंसी कह रही है कि ये कानूनी कार्रवाई है। लेकिन बंसल समर्थकों और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि कार्रवाई का समय सवाल खड़े करता है। क्योंकि ठीक इसी वक्त हनुमानगढ़ नगर परिषद में बोर्ड गठन की लड़ाई चल रही थी।

दरअसल हनुमानगढ़ की 60 सीटों वाली परिषद में बीजेपी के पास 15 सीटें हैं, जबकि गणेशराज बंसल खेमे से जुड़े करीब 32 निर्दलीय पार्षदों की संख्या बताई जा रही है। यानी बोर्ड बनाने के गणित में निर्दलीय पार्षद बेहद महत्वपूर्ण हो गए थे।

और तभी विधायक की गिरफ्तारी, फिर उनके समर्थक 9 पार्षदों को लेकर गिरफ्तारी की आशंका और आखिरकार रविवार रात हाईकोर्ट की विशेष सुनवाई रात 10 बजे कोर्ट खुला और सुनवाई तड़के 2 बजे तक चली। हाईकोर्ट ने हनुमानगढ़ के 9 पार्षदों को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा दी।

और सिर्फ हनुमानगढ़ नहीं, बीकानेर में भी चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्षद मकसूद अहमद को पुराने मामले में पुलिस का नोटिस मिला। उन्होंने गिरफ्तारी की आशंका जताई और हाईकोर्ट पहुंचे। अदालत ने वहां भी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी।

यानी हालात इतने खराब हुए कि एक ही रात में अदालत को कई पार्षदों की चुनावी भागीदारी सुरक्षित करने और जनता के जनादेश को बचाने के लिए दखल तक देना पड़ा हस्तक्षेप करना पड़ा।

ये किस्सा सिर्फ हनुमानगढ़ या बीकानेर का नहीं बल्कि कुचेरा, डेगाना, भरतपुर, अलवर, खैरथल जैसे कई निकायों का है, यहां कांग्रेस ने आरोप लगाया कि पुलिस और प्रशासन के जरिए पार्षदों पर दबाव बनाया जा रहा है। टोंक के दूनी में बीजेपी से जीतीं पार्षद अर्चना बड़गुर्जर के परिजनों ने उनके लापता होने का आरोप लगाया। परिजन कांग्रेस कार्यालय तक पहुंचे और अर्चना को वापस लाने की मांग की।

डोटासरा ने दी थी सरकार को चेतावनी

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने बीजेपी पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाया था और कहा था कि अगर खूनखराबा हुआ तो जिम्मेदारी सरकार और पुलिस प्रशासन की होगी।

यानी एक तरफ बाड़ेबंदी दूसरी तरफ पुलिस कार्रवाई के आरोप कहीं पार्षदों को रोकने के आरोप, कहीं पार्षदों के गायब होने की शिकायत और कहीं पुराने मामलों में अचानक पुलिस कार्रवाई, तो सवाल ये नहीं है कि किस पार्टी का पार्षद कहां जा रहा है, सवाल ये है कि क्या जनता के वोट से चुना गया पार्षद अपनी मर्जी से वोट कर पाएगा? क्योंकि अगर किसी पार्षद को चुनाव के ठीक पहले कानूनी कार्रवाई का डर हो, अगर उसके परिवार को उसके बारे में जानकारी नहीं हो। अगर उसे पुलिस कार्रवाई की आशंका में अदालत जाना पड़े तो फिर सवाल सिर्फ बीजेपी या कांग्रेस का नहीं रह जाता, सवाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया का बन जाता है।

इन तथ्यों से तो एक ही बात समझ में आती है कि सरकार चाहे कोई हो, पार्टी चाहे कोई हो, हर बार पिसना जनता को ही पड़ता है, पहले सवाल कांग्रेस से पूछा जाता था, आज सवाल बीजेपी सरकार से पूछा जा रहा है। तब आरोप था कि सत्ता बचाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल हुआ। आज आरोप है कि बोर्ड गठन के गणित को प्रभावित करने के लिए पुलिस और जांच एजेंसियों का इस्तेमाल हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब सत्ता में कांग्रेस थी, आज बीजेपी है। लोकतंत्र में जनता वोट देती है, जनता तय करती है कि उसका पार्षद कौन होगा। लेकिन पार्षद चुने जाने के बाद अगर असली फैसला बाड़ेबंदी, दबाव, पुलिस कार्रवाई या गिरफ्तारी के डर के बीच होने लगे तो सवाल तो उठेगा ना कि जनादेश किसका है? जनता का या सत्ता के दबाव का? हनुमानगढ़ में विधायक की गिरफ्तारी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। 23 साल पुराने पट्टा मामले की जांच भी कानून के मुताबिक हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र में कानूनी कार्रवाई और राजनीतिक समय-निर्धारण के बीच अंतर साफ रखना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि अगर कार्रवाई वास्तव में कानूनी है तो उसे अदालत में साबित होना चाहिए। और अगर राजनीतिक दबाव के आरोप गलत हैं तो सरकार के पास उन्हें खारिज करने और पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी रखने का रास्ता खुला है।

हालांकि आज ये साफ दिख जाएगा कि निर्वाचित पार्षद बिना दबाव के अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर पाते हैं या नहीं। क्योंकि आखिर में जनादेश जनता का है—और उसकी रक्षा सिर्फ चुनाव के दिन नहीं, चुनाव के बाद भी होनी चाहिए।

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