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डांगावास पर चंद्रशेखर अकेले क्यों दिखे? बेनीवाल की गैरमौजूदगी ने खड़े किए गठबंधन पर सवाल

डांगावास पर चंद्रशेखर अकेले क्यों दिखे? बेनीवाल की गैरमौजूदगी ने खड़े किए गठबंधन पर सवाल
राजस्थान
22 Aug 2026, 01:02 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

जयपुर: राजस्थान की सियासत में कभी साथ नजर आने वाले चंद्रशेखर आजाद और हनुमान बेनीवाल बीते शुक्रवार को डांगावास के मुद्दे पर एक मंच पर दिखाई नहीं दिए। नागौर के डांगावास हत्याकांड में 5 दलितों समेत 6 लोगों की मौत के मामले में सभी 40 आरोपियों के बरी होने के बाद चंद्रशेखर आजाद ने जयपुर में मोर्चा संभाला, लेकिन इस पूरे आंदोलन में हनुमान बेनीवाल की गैरमौजूदगी ने दोनों नेताओं के सियासी रिश्ते और भविष्य के गठबंधन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

डांगावास का मामला सिर्फ एक पुराना जमीन विवाद नहीं है। 2015 की हिंसा में 5 दलितों की मौत हुई थी और 3 लोगों को ट्रैक्टर से कुचलने का आरोप भी सामने आया था। करीब 11 साल चली सुनवाई के बाद मेड़ता की विशेष SC-ST अदालत ने अगस्त में सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत के फैसले के बाद दलित संगठनों में नाराजगी है और मामले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की मांग उठ रही है।

चंद्रशेखर ने डांगावास को दलित न्याय का मुद्दा बनाया

चंद्रशेखर आजाद ने डांगावास को सीधे दलित न्याय और सामाजिक बराबरी के सवाल से जोड़ दिया है। 21 अगस्त को जयपुर के शहीद स्मारक पर हुए प्रदर्शन में उन्होंने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और सरकार और जांच एजेंसियों पर सवाल उठाए। उन्होंने 10 दिन बाद जयपुर से डांगावास तक पैदल मार्च निकालने का भी ऐलान किया है और अनिश्चितकालीन महापंचायत की चेतावनी भी दी है।

यानी चंद्रशेखर के लिए ये मुद्दा राजनीतिक रूप से साफ है—दलितों की हत्या हुई, आरोपी बरी हुए और अब पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए आंदोलन होना चाहिए। यहीं से हनुमान बेनीवाल की गैरमौजूदगी का सवाल पैदा होता है।

बेनीवाल क्यों नहीं आए? यहीं से शुरू होती है सियासी कहानी

डांगावास नागौर की राजनीति से जुड़ा मामला है और हनुमान बेनीवाल की राजनीतिक जमीन भी नागौर रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब चंद्रशेखर आजाद इस मुद्दे को लेकर जयपुर में आंदोलन कर रहे थे, तब बेनीवाल उनके साथ क्यों नहीं दिखाई दिए?

इसका एक राजनीतिक कारण ये माना जा रहा है कि डांगावास का संघर्ष दलित बनाम जाट टकराव की सामाजिक छवि से भी जुड़ा रहा है। हालांकि कानूनी तौर पर पूरे मामले में सभी 40 आरोपी बरी हो चुके हैं और अदालत ने अभियोजन के सबूतों को पर्याप्त नहीं माना।

राजनीतिक तौर पर यही सबसे संवेदनशील प्वाइंट है। चंद्रशेखर जिस सामाजिक समूह के साथ खड़े होकर डांगावास को न्याय का सवाल बना रहे हैं, वहीं बेनीवाल की राजनीति का बड़ा आधार जाट और किसान राजनीति से जुड़ा रहा है। ऐसे में क्या बेनीवाल के लिए इस आंदोलन के साथ खड़ा होना राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा कर सकता है? ये सवाल अब उठ रहा है।

चंद्रशेखर ने बेनीवाल पर सीधा आरोप नहीं लगाया

दिलचस्प बात ये है कि चंद्रशेखर आजाद ने खुद इस दूरी को किसी खुले राजनीतिक विवाद के रूप में पेश नहीं किया। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने डांगावास मामले को लेकर जयपुर आने का ऐलान किया था। हनुमान बेनीवाल का उनके पास फोन आया था।

चंद्रशेखर के मुताबिक, उस समय वो बिजी थे, इसलिए फोन नहीं उठा पाए। बाद में उन्होंने बेनीवाल को वापस फोन करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। यानी सार्वजनिक तौर पर सामने आई कहानी अभी टकराव से ज्यादा संपर्क टूटने की है। लेकिन राजनीतिक टाइमिंग ने इसे बड़ा सवाल जरूर बना दिया है।

क्या गठबंधन में दरार आ रही है?

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। चंद्रशेखर आजाद और हनुमान बेनीवाल का साथ राजस्थान की राजनीति में एक ऐसे सामाजिक-राजनीतिक समीकरण की संभावना पैदा करता है, जिसमें दलित, किसान और गैर-परंपरागत राजनीतिक वोट बैंक को एक साथ लाने की कोशिश दिखाई देती है। ऐसे में डांगावास जैसा मुद्दा इस समीकरण की असली परीक्षा बन सकता है।

अगर दोनों नेता हर मुद्दे पर एक साथ खड़े होते हैं, तो ये गठबंधन की मजबूती का संदेश देता है। लेकिन अगर दलित हितों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर चंद्रशेखर अलग और बेनीवाल अलग दिखाई देते हैं, तो विरोधी दलों को इस गठबंधन की सामाजिक सीमाओं पर सवाल उठाने का मौका मिलेगा।

खासकर राजस्थान में आने वाले चुनावों को देखते हुए ये सवाल अहम हो जाता है कि क्या दोनों नेता सिर्फ चुनावी सीटों और सत्ता विरोधी राजनीति के मुद्दों पर साथ हैं या सामाजिक न्याय जैसे कठिन मुद्दों पर भी उनकी राजनीतिक लाइन एक है?

फिलहाल सिर्फ डांगावास आंदोलन में बेनीवाल की गैरमौजूदगी को देखकर ये कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों के गठबंधन में दरार पड़ गई है। चंद्रशेखर के मुताबिक दोनों के बीच संपर्क की कोशिश हुई थी। अब यही मुद्दा आने वाले दिनों में इस संभावित राजनीतिक गठजोड़ की दिशा तय कर सकता है।

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