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चंबल जल बंटवारे पर विवाद: 13 जुलाई को कोटा में किसानों का महापड़ाव, पहले राजस्थान तो अब एमपी नहीं दे रहा पानी

चंबल जल बंटवारे पर विवाद: 13 जुलाई को कोटा में किसानों का महापड़ाव, पहले राजस्थान तो अब एमपी नहीं दे रहा पानी
राजस्थान
10 Jul 2026, 01:36 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

पांचना बांध और मोरेल बांध पर भी गतिरोध ठीक से टूटा नहीं है कि एक और पानी के विवाद ने अपना सिर उठा लिया है। ये विवाद उठा है चंबल के गांधी सागर बांध से पानी देने का। राजस्थान ने एमपी से 6000 क्यूसेक पानी छोड़ने की मांग की थी लेकिन अब तक ना तो पानी छोड़ा गया औऱ ना ही एमपी सरकार ने इस पर कोई जवाब दिया। ऐसे में किसानों ने कोटा में 13 जुलाई को महापड़ाव का ऐलान कर दिया है और जल्द से जल्द पानी उपलब्ध कराने की मांग की है।

चंबल जल बंटवारे का नहीं हो रहा पालन

हाड़ौती के किसानों ने आरोप लगाया है कि समय पर उन्हें मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीच हुए समझौते के अनुरूप पानी नहीं मिल रहा है, चंबल जल परियोजना के जल बंटवारे के समझौते का पालन नहीं किया जा रहा है। इससे अब प्रदेश में खरीफ की फसलों की सिंचाई पर संकट आ गया है। किसानों ने इस मामले में सरकार से दखल देने की मांग की है कि और चेतावनी दी है कि अगर 3 दिन में इसका समाधान नहीं हुआ तो 13 जुलाई को कोटा में कमांड एरिया डेवलपमेंट सर्किल कार्यालय पर महापड़ाव और बड़ा आंदोलन किया जाएगा।

6 जुलाई को राजस्थान ने लिखा एमपी को लेटर

जानकारी के मुताबिक 6 जुलाई को कमांड एरिया डेवलपमेंट के मुख्य अभियंता और संदीप माथुर ने मध्य प्रदेश के जल संसाधन विभाग उज्जैन और मुख्य अभियंता नर्मदा तापी बेसिन को एक लेटर लिखा था जिसमें मांग की गई थी कि दो दिन में राजस्थान के एक महीने तक 6000 क्यूसेक पानी दे दें। जिसमें कोटा बैराज से दाईं तरफ की मुख्य नहर में 4500 क्यूसेक और बाईं तरफ की नहर में 1500 क्यूसेक पानी छोड़ने को कहा गया था।

जून में एमपी ने राजस्थान से मांगा था पानी, तब दिया नहीं

इस मामले में दूसरा पक्ष ये निकल कर आ रहा है कि जून महीने में मध्य प्रदेश की सरकार ने भी राजस्थान सरकार को एक लेटर लिखा था। जिसमें चंबल की दाईं तरफ वाली मुख्य नहर में पानी छोड़ने को कहा था। एमपी के जल संसाधन विभाग के कार्यपालक मंत्री चैतन्य चौहान ने कोटा CAD के मुख्य (अधीक्षण) अभियंता को 10 जून को ये लेटर लिखा था। ये पानी चंबल सूक्ष्म सिंचाई परियोजना के तहत लिफ्ट एरिगेशन पाइपलाइन के संचालन की टेस्टिंग के लिए 10 जून से 24 जून तक पार्वती एक्वाडक्ट से 1200 क्यूसेक पानी मांगा था।

उस वक्त राजस्थान सरकार ने पानी देने से इनकार कर दिया था। यही बात मध्य प्रदेश सरकार को चुभ गई और अब जब राजस्थान, एमपी से पानी मांग रहा है तो वो जवाब नहीं दे रहा है। सरकारों के बीच की इस तनातनी के चलते अब हाड़ौती क्षेत्र के किसान फसलों की सिंचाई के लिए तरस रहे हैं। उन्हें पानी नहीं मिल रहा है। कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ सहित हाड़ौती क्षेत्र के किसान पानी के लिए परेशान हो रहे हैं।

ये है पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना का समझौता

दोनों राज्यों के बीच पानी के आदान-प्रदान का ये समझौता ERCP का हिस्सा है। दोनों प्रदेशों की जनता को पानी उपलब्ध कराने का है। इससे मानसून के वक्त चंबल, कालीसिंध, पार्वती नदियों का जो अतिरिक्त पानी समंदर में बेकार चला जाता है उसे बांधों और नहरों के जरिए दोनों राज्यों में मोड़ा गया है।

इससे मध्य प्रदेश के मालवा और चंबल के 13 से 15 जिलों को पानी मिलता है खासकर ड्राई बेल्ट में। इसमें ग्वालियर,मुरैना, शिवपुरी, गुना, भिंड, श्योपुर शामिल हैं। वहीं राजस्थान में पूर्वी हिस्से के 13 जिलों को ये पानी मिल रहा है। इसमें कोटा, झालावाड़, बारां, बूंदी, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर, भरतपुर, दौसा, अलवर, जयपुर, अजमेर, टोंक शामिल हैं।

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