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स्वास्थ्य विभाग में 11 महीने से चल रहा खेल, अनुभवहीन अधिकारी की प्रतिनियुक्ति, करा दिया 1000 करोड़ का EPC टेंडर

स्वास्थ्य विभाग में 11 महीने से चल रहा खेल, अनुभवहीन अधिकारी की प्रतिनियुक्ति, करा दिया 1000 करोड़ का EPC टेंडर
राजस्थान
01 Aug 2026, 03:10 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

जरा सोचिए अगर किसी विभाग में चीफ इंजीनियर का पद 11 महीने से खाली हो, लेकिन उस कुर्सी पर दूसरे विभाग का अधिकारी लगातार बैठा रहे और उस अधिकारी की प्रतिनियुक्ति की अवधि भी खत्म हो चुकी हो, और तो और, अगर उसी दौरान करीब 1000 करोड़ रुपये के EPC टेंडर भी निकल जाएं तो सवाल उठेंगे या नहीं?

जल संसाधन विभाग के अधिकारी की स्वास्थ्य विभाग में प्रतिनियुक्ति

दरअसल राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग में नियमों से ज्यादा चर्चा रसूख की हो रही है। आरोप ये है कि स्वास्थ्य विभाग की सिविल शाखा में मुख्य अभियंता यानी चीफ इंजीनियरका पद पिछले करीब 11 महीने से नियमित रूप से भरा नहीं गया। बताया जा रहा है कि इस पद का अतिरिक्त प्रभार जल संसाधन विभाग के एक सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर मुकेश शर्मा के पास है। यहीं से पहला सवाल खड़ा होता है कि अगर विभाग में योग्य और वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं तो फिर अतिरिक्त चार्ज लगातार एक बाहरी विभाग के अधिकारी के पास क्यों है।

जल विभाग का अनुभव, स्वास्थ्य विभाग के टेंडर कैसे निकाले

मुकेश शर्मा का अनुभव जल संसाधन परियोजनाओं का है तो क्या बिल्डिंग निर्माण और हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्र का अनुभव को ताक कर पर दिखा गया और प्रतिनियुक्ति हुई। अगर नहीं तो फिर यह फैसला किन आधारों पर लिया गया? क्या स्वास्थ्य विभाग में Chief Engineer बनने के लिए योग्यता जरूरी नहीं, क्या अतिरिक्त चार्ज 11 महीने तक चलता है या फिर इसे स्थायी नियुक्ति का नया नाम दे दिया गया, क्या विभाग में वरिष्ठ अधिकारी सिर्फ फाइलें देखने के लिए बैठे हैं? क्या नियम सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर लागू होते हैं?

और सबसे बड़ा सवाल जब विभाग लगभग 4000 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट देख रहा हो और करीब 1000 करोड़ रुपये के EPC टेंडर जारी हुए हों तो क्या इतने बड़े फैसले अतिरिक्त चार्ज के भरोसे चलने चाहिए।

करीब 1000 करोड़ रुपये के EPC मॉडल वाले टेंडरों में कुछ चुनिंदा कंपनियों को ही ज्यादातर काम मिलने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। अगर ये सही है तो इसकी निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।

मुख्य शासन सचिव गायत्री राठौड़ के आशीर्वाद के दम पर टिके हैं साहब?

लेकिन अभी रुकिए, सवाल यहीं खत्म नहीं हुए क्योंकि विभाग के भीतर ये चर्चा भी है कि मुकेश शर्मा को उच्च स्तर का संरक्षण मिला हुआ है। जो है प्रमुख शासन सचिव गायत्री राठौड़ का, दावा है कि जहां-जहां मैडम की पोस्टिंग रही है, ये साहब भी वहां-वहां पद पा गए हैं। चाहे वो 2009 में JDA से शुरू हुई पोस्टिंह, जो Archaeology विभाग से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक अब तक जारी है। ये कोई संयोग तो नहीं लगता। आखिर इसके पीछे का क्या राज ये खुलना तो बनता है, अगर ऐसे आरोप बार-बार सामने आ रहे हैं तो सरकार के लिए इनकी जांच कराना और भी जरूरी हो जाता है।

इतना ही नहीं विभागीय सूत्र हर महीने कथित 'महीना वसूली' के आरोप भी लगा रहे हैं। अगर ये आरोप सही हैं तो ये सिर्फ भ्रष्टाचार का मामला नहीं। बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवाल है। हालांकि इन आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है।

सरकार को कोई खैर-खबर है या नहीं?

तो सवाल सवाल सरकार से कि क्या 11 महीने से चल रही इस व्यवस्था की जांच होगी? क्या प्रतिनियुक्ति और अतिरिक्त प्रभार के नियमों की समीक्षा होगी? क्या 1000 करोड़ रुपये के EPC टेंडरों की स्वतंत्र जांच होगी? क्या वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी के आरोपों की जांच होगी? और सबसे जरूरी, क्या जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले विभाग में जवाबदेही तय होगी?

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