राजस्थान निकाय चुनाव 2026: CM से पूर्व CM तक...दिग्गजों के गढ़ में BJP को झटके, निर्दलीयों ने बिगाड़ा गणित

राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के आज के रुझान अब नतीजों में बदलने लगे हैं। सुबह 11 बजे तक को रुझान बीजेपी में जश्न का माहौल पैदा कर रहे थे, दोपहर 2 बजे तक तो बड़ा उलटफेर लेते हुए कहीं खुशी और कहीं गम की स्थिति बना गए। जहां पहले 10 निगमों में से 8 में बीजेपी ने बढ़त बनाई हुई थी अब वो संख्या 5 पर आ गई है। राजस्थान के निकायों में प्रत्याशियों की जीत-हार से भी ज्यादा चर्चा हो रही है उन निकायों की जहां पर बीजेपी के दिग्गज नेताओं का गढ़ है, कोई किसी का गृह नगर है तो कोई चुनावी क्षेत्र। जी हां यहां हम बात कर रहे हैं भरतपुर, पाली, झालावाड़ और जोधपुर की।
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले पाली में निकाय चुनाव का परिणाम पार्टी के लिए सबसे ज्यादा चर्चा वाला पहलू बनकर सामने आया है। पाली नगर निगम में 65 वार्ड में से 21 पर बीजेपी जीती है जबकि 29 पर कांग्रेस आई है और 15 निर्दलीय और थर्ड पार्टी को गई है।
चुनाव से ठीक पहले पाली में भाजपा के वरिष्ठ स्थानीय नेता राकेश भाटी का पार्टी छोड़कर कांग्रेस में जाना भी चर्चा में रहा था। इसे भाजपा के लिए स्थानीय संगठन और टिकट वितरण से जुड़ी चुनौती के तौर पर देखा गया।
इससे ये समझ में आता है कि टिकट वितरण से पैदा हुआ असंतोष, स्थानीय नेताओं के बीच खींचतान, बागी और निर्दलीय उम्मीदवार ने निकाय चुनाव की नतीजे पलट दिए।
झालावाड़ में वसुंधरा राजे के गढ़ में कांग्रेस की बड़ी सेंध
राजस्थान की राजनीति में झालावाड़ को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता है। लेकिन 45 वार्डों वाली झालावाड़ नगर परिषद में कांग्रेस ने 29 वार्ड जीत लिए, जबकि भाजपा को बड़ा झटका लगा। ये नतीजे इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा यहां लंबे समय से मजबूत राजनीतिक ताकत रही है। ऐसे में कांग्रेस की इतनी बड़ी बढ़त ये संकेत देती है कि परंपरागत राजनीतिक गढ़ भी स्थानीय चुनाव में अभेद्य नहीं रहते।
भरतपुर: निर्दलीयों ने क्यों बढ़ाई दोनों पार्टियों की चिंता?
भरतपुर, जो कि प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह नगर हैमें, वहां पर सिर्फ बीजेपी-कांग्रेस दोनों की ही शर्मनाक हार हुई है। यहां पर इस पर निर्दलियों ने जीत दर्ज की है। बोर्ड भी अब निर्दलियों का ही बनेगा।
भरतपुर नगर निगम में 65 वार्ड हैं। चुनाव से पहले भाजपा ने 57 और कांग्रेस ने भी 57 वार्डों में उम्मीदवार उतारे थे, जबकि बड़ी संख्या में निर्दलीय मैदान में थे। अकेले भरतपुर नगर निगम में 272 निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में थे।
यहां एक खास बात और सामने आई थी—भरतपुर के वार्ड 19 में एक ही नेता मनोज सिंह को भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उम्मीदवार बनाने की कोशिश की, जिसने स्थानीय राजनीति में टिकट और उम्मीदवार चयन की अहमियत को उजागर किया।
इस चुनाव का सबसे बड़ा कारण टिकट वितरण से पैदा हुआ असंतोष माना जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ऐसे स्थानीय नेता और कार्यकर्ता रहे जिन्होंने टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ने का रास्ता चुना।
इसके अलावा अजमेर में भाजपा से जुड़े पांच सक्रिय नेताओं ने टिकट कटने के बाद पार्टी से इस्तीफा देकर निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। यानी पार्टी के लिए जिस कार्यकर्ता ने वर्षों तक वार्ड में संगठन खड़ा किया, अगर वही टिकट नहीं मिलने के बाद बागी बन जाए तो वह पार्टी के वोट को ही काट सकता है।
जोधपुर में भी तस्वीर सीधी BJP बनाम कांग्रेस नहीं
जोधपुर नगर निगम के 100 वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर दिखाई दी। दोनों दल 44-44 वार्ड जीत चुके थे, जबकि अन्य उम्मीदवारों के खाते में भी सीटें गई थीं। यहां के सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत बीजेपी के और खुद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कांग्रेस के बड़े चेहरे हैं, लेकिन बावजूद इसके कुछ खास कमाल ये पार्टी नहीं कर पाई और एक ही आंकड़ें पर ये दोनों खड़ी हो गईं।
बीकानेर और अजमेर ने भी दिया अलग संदेश
बीकानेर में भी कांग्रेस का प्रदर्शन कई जगह मजबूत रहा, जबकि भाजपा ने भी कई वार्डों में जीत दर्ज की। शुरुआती परिणामों में भाजपा और कांग्रेस के साथ निर्दलीय प्रत्याशी भी जीतते दिखाई दिए।
अजमेर में चुनाव से पहले भाजपा के भीतर टिकट वितरण को लेकर असंतोष और नेताओं के निर्दलीय मैदान में उतरने की खबरें सामने आई थीं।
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