क्या जा सकती है राघव चड्ढा की सांसदी? अवैध है उनका बीजेपी में विलय करना?

Raghav Chaddha: राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने अपने साथी 6 सांसदों के साथ शुक्रवार को बीजेपी में विलय कर लिया जिसके बाद राष्ट्रीय राजनीति में भूचाल आ गया है। भले ही राघव चड्ढा ने अपने सांसदों के साइन किए लेटर दिखाकर आप (AAP) छोड़ी और बीजेपी ज्वाइन की लेकिन आम आदमी पार्टी इसे अवैध बता रही है। विश्लेषकों के मुताबिक अब आम आदमी पार्टी (Aam Admi Party) सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगी ताकि 3 सांसदों की अयोग्यता के लिए दबाव बनाया जा सके। दूसरी आप पार्टी राज्यसभा के सभापति को एक लेटर भी भेज रहे हैं। जिसमें इन सांसदों और मुख्य सचेतक एनडी गुप्ता के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे। इस लेटर में 10वीं अनुसूची का हवाला दिया जा रहा है। इसी 10वीं अनुसूची के आधार पर ही आम आदमी पार्टी कह रही है कि राघव चढ्डा और उनके साथ 7 सांसदों का जाना अवैध है।
क्या है ये 10वीं अनुसूची (Anti defection Law)
आप संयोजक अरविंद केजरीवाल और पूर्व डिप्टी CM मनीष सिसोदिया जिस 10वीं अनुसूची को आधार बनाकर राघव के खिलाफ कार्रवाई करने वाले हैं उसे एंटी डिफेक्शन कानून यानी दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है। क्या कहता है कानून, इसे समझते हैं-
- दलबदल विरोधी कानून उन लोगों के लिए बनाया गया है जो चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी छोड़ देते हैं और दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं। ये एक तरह से पार्टी के जनादेश का उल्लंघन माना जाता है। अगर कोई सदस्य अपनी पार्टी छोड़ता है और दूसरी में शामिल होता है तो उस पर दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की जाती है। लेकिन अगर उस मेंबर के साथ पूरी पार्टी के दो तिहाई सदस्य पार्टी छोड़ने के लिए सहमत हो जाते हैं, तो ये दल-बदल विरोधी कानून काम नहीं करेगा। उस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। उसे अयोग्य ठहराया नहीं सकता।
- इसीलिए केजरीवाल इसी दलबदल विरोधी कानून का सहारा ले रहे हैं कि राघव चड्ढा को किसी तरह को अयोग्य घोषित करा दिया जाए। यानी ये साबित करा दिया जाए कि राघव चड्ढा पार्टी के जिन दो तिहाई सदस्यों के अपने साथ होने की बात कर रहे हैं वो तो है ही नहीं।
- वहीं सदस्य अयोग्य है या नहीं इस बात का फैसला सदन के अध्यक्ष यानी लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति करते हैं।
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10वीं अनुसूची में क्या-क्या है प्रावधान?
- अगर सदन का कोई सदस्य अचानक अपनी पार्टी छोड़ता है और दूसरी पार्टी ज्वाइन करता है तो इसी के हिसाब से कार्रवाई होगी।
- अगर सदस्य पार्टी के निर्देशों के उलट सदन में वोटिंग करता है या गैरमौजूद रहते हैं यानी व्हिप का उल्लंघन करते हैं।
- ऐसा मामला 4 साल पहले महाराष्ट्र में हुआ था। जब महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार से एकनाथ शिंदे अपने विधायकों को लेकर अलग हो गए थे। तब भी यही हुआ था। लेकिन अभी तक ये मामला सुप्रीम कोर्ट में अटका हुआ था और अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। सिर्फ दोनों ही गुटों को शिवसेना के ही अलग-अलग नाम दे दिए गए हैं।
क्या राघव चड्ढा की सांसदी जाएगी
अगर राघव चड्ढा इस 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित हो जाते हैं, यानी वो ये साबित नहीं कर पाते कि उनके साथ पार्टी के दो तिहाई सदस्य यानी 6 सांसद हैं तो उनकी सदन की सदस्यता जा सकती है। लेकिन राघव चड्ढा के साथ ऐसा नहीं होगा क्योंकि ये नियम लोकसभा और विधानसभाओं में ही लागू होता है, राज्यसभा में नहीं। यानी वे अयोग्य होने के बाद भी सांसद बने रहेंगे। क्योंकि अभी तक वो लेटर जिसमें सातों सांसदों के साइन हैं वो सार्वजनिक नहीं किया गया है और सिर्फ 3 सांसदों ने ही सार्वजनिक तरीके से आप छोड़ने की ऐलान किया गया है।
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