बेहद हिंसक रहा प. बंगाल की सियासत का इतिहास, आखिर ममता से कैसे पार पाएगी बीजेपी?

बेहद हिंसक रहा प. बंगाल की सियासत का इतिहास, आखिर ममता से कैसे पार पाएगी बीजेपी?
राष्ट्रीय
22 Apr 2026, 05:15 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

पश्चिम बंगाल को 'ज्ञान और क्रांति की धरती' कहा जाता है। लेकिन इसकी पहचान अब 'राजनीतिक हिंसा' बन चुकी है। यहां सत्ता का रास्ता आज भी बारूद के धुएं और चीखों के बीच से होकर गुजरता है। यहां जीतने के लिए इस बार बीजेपी अपना पूरा दम-खम लगा रही है। हर एक मुद्दे को छू रही है। चाहे वो चुनावों में पारदर्शिता हो, हिंसा हो, बीजेपी नेताओं की हत्या हो, हिंदुओं के साथ अत्याचार हो या घुसपैठियों का मामला हो। पश्चिम बंगाल की जनता की हर नब्ज़ को बीजेपी छू रही है। बंगाल में ये बदलाव लाना कितना जरूर है उसके लिए आपको यहां का हिंसक इतिहास जानना होगा।

तारीख 16 मार्च 1970 को बंगाल की यूनाइटेड फ्रंट सरकार गिरी और अगले ही दिन CPI (M) ने बंगाल बंद बुलाया। वर्धमान के सैनवाड़ी मोहल्ले में रहने वाला 'सैन परिवार' कट्टर कांग्रेसी था। उस दिन उनके घर में एक नवजात का नामकरण संस्कार था, खुशियां थीं। लेकिन बाहर CPI (M) के कार्डर का गुस्सा उबल रहा था।

एक मां को खाने पड़े खुद के बच्चों के खून से सने चावल

राजनीतिक दुश्मनी की इंतहा देखिए-भीड़ घर में घुसी, मलय सेन और प्रणव सेन को उनकी मां के सामने मार डाला गया। और फिर वो हुआ जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया। मां मृगनैना देवी को अपने ही बेटों के खून से सने चावल खाने पर मजबूर किया गया। यह घटना बंगाल की हिंसा का वो 'भद्दा बेंचमार्क' बनी, जिसने संदेश दिया कि यहां राजनीति सिर्फ विचारधारा की नहीं, बल्कि वजूद मिटाने की जंग है।

1939 में RSS शाखा की रखी गई बंगाल में नींव

लेकिन कहानी सिर्फ हिंसा की नहीं, बल्कि एक गहरी 'सियासी शिफ्ट' की भी है। चलिए पीछे चलते हैं-साल 1939। कोलकाता के माणिक तला मैदान में दो मराठी, माधव सदाशिव गोलवलकर और विट्ठल राव पटकी ने RSS की पहली शाखा की नींव रखी।हैरानी की बात है कि जिस प्रदेश ने जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को दिया, वहां भाजपा को अपनी जमीन तलाशने में दशकों लग गए। 2014 की मोदी लहर में भी भाजपा यहां सिर्फ 2 सीटें जीत पाई थी। लेकिन 2019 में ऐसा क्या हुआ कि भाजपा सीधे 18 सीटों पर पहुंच गई?

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इसका जवाब है- CPI (M) का बिखरता हुआ किला। साल 2011 में ममता बनर्जी ने 34 साल का वामपंथी शासन उखाड़ फेंका। CPI (M) का वो 'मसल पावर' वाला कार्डर, जो कभी तृणमूल से लड़ता था, उसे एक मजबूत छत की जरूरत थी। CPI (M) के जनरल सेक्रेटरी सीताराम येचुरी ने खुद माना कि उनका वोटर बड़ी संख्या में भाजपा के साथ गया। नारा लगा-'एबार राम, पोर बार बाम" (इस बार राम, अगली बार वाम)। लेकिन असलियत ये थी कि CPI (M) के जमीनी कार्यकर्ताओं ने तृणमूल के आतंक से बचने के लिए भाजपा का दामन थाम लिया।

2023 के पंचायत चुनावों में 55 से ज्यादा मौतें

बंगाल में चेहरे बदले, पार्टियां बदलीं, पर तरीका नहीं बदला। पंचायत चुनाव हों या विधानसभा चुनाव, 'बम' आज भी यहां का चुनावी उपकरण है। साल 2023 के पंचायत चुनावों में 55 से ज्यादा मौतें हुईं। आरोप लगा कि हजारों सीटों पर विपक्ष को पर्चा तक नहीं भरने दिया गया और इस हिंसा के पीछे खड़े हैं वो 'मसल मैन' जो सत्ता के साथ अपनी वफादारी बदलते रहते हैं। उदाहरण है—शाहजहां शेख। संदेशखाली कांड का ये मुख्य आरोपी कभी CPI (M) का सिपाही था, लेकिन 2011 में हवा बदली तो ये TMC का 'खास' बन गया। ये भू-माफियाओं और बाहुबलियों का वो नेक्सस है जो बंगाल के गांव-गांव में लोकतंत्र का गला घोंट रहा है।

अब बंगाल 2026 के विधानसभा चुनावों की तरफ बढ़ रहा है। 23 और 29 अप्रैल को होने वाले इस चुनाव में मुकाबला सीधा है-तृणमूल का 'कल्याणकारी योजनाओं' का मॉडल बनाम भाजपा का 'परिवर्तन' का नारा लेकिन क्या बारूद की ये गंध खत्म होगी? इतिहास गवाह है कि बंगाल ने खुद को बार-बार लहूलुहान करके दोबारा गढ़ा है। यहां सवाल सिर्फ ये नहीं है कि कौन जीतेगा, सवाल ये है कि क्या बंगाल के किसी 'सैन परिवार' को दोबारा उस क्रूरता का सामना तो नहीं करना पड़ेगा?

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